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नागौर

बड़े पीर साहब की दरगाह जिसके चर्चे इराक तक प्रसिद्ध हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक

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आप पढ़ रहे हैं अब्दुल वहाब सहाब जिलानी की दरगाह के बारे में।नागौर में स्थित इस दरगाह को सांप्रदायिक सौहार्द स्थल के रूप में भी जाना जाता है। यही दरगाह बड़े पीर साहब की दरगाह के नाम से प्रसिद्ध है। अब्दुल वहाब शाह गिलानी के पिता इराक में गौस-ए आजम के नाम से प्रसिद्ध हैं। दरगाह में दूरदराज से लोग आते हैं और अपनी दुआओं को पीर सहाब के आगे रख देते हैं।दरगाह की एक खिड़की पर वे लोग अपनी मन्नत के धागे बांधते हैं।बड़े पीर साहब की इस दरगाह को प्रदेश की सरकार ने 5 मई 2020 को राजस्थान टूरिज्म सर्किट में शामिल किया है।

तकरीबन 800 साल से भी ज्यादा पुरानी यह दरगाह कादरिया संप्रदाय की देश की सबसे बड़ी दरगाह के रूप में एक अलग ढंग की अपनी एक पहचान रखती है।सैयद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जीलानी की मजार है।देशभर से खूब लोग आते हैं।राजस्थान टूरिज्म सर्किट में शामिल होने के बाद यहां आने वाले जायरीनों की संख्या बढ़ने के साथ ही सुविधाओं में भी इजाफा होने की आशा बंधी है।स्थानीय जन बताते हैं कि बगदाद से ख्वाजा गरीब नवाज और सैयद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जीलानी साथ ही अजमेर आए थे। अजमेर के तारागढ़ में बड़े पीर साहब का चिल्ला भी है।इसके बाद वाया मेड़ता सिटी,सैयद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जीलानी नागौर पहुंचे और वहाँ जिस खेजड़ी के पेड़ के नीचे वे बैठे थे वह आज भी मौजूद है।

दरगाह के अंदर एक बहुत बड़ा म्यूजिक बना हुआ है।उसके अंदर कई पुरानी चीजें जैसे. – शुतुरमुर्ग के अंडे, तमाम शासकों द्वारा पेश की गई वस्तुएं जिनमें चांदी की चूड़ियां, चिमटे, सिक्के आदि शामिल है।और भी कई अद्भुत ऐतिहासिक चीजें दरगाह के इस म्यूजियम में शामिल की गयी हैं।वहां के एक स्थानीय व्यक्ति बताते हैं कि औरंगजेब स्वयं 1680 में यहां आए थे और उन्होंने लकड़ी की पालकी यहाँ भेंट की थी।वह आज भी दरगाह में रखी हुई है। म्यूजियम में 500 वर्ष तक की वंशावली भी रखी हुई है। बीकानेर के राजा द्वारा भी दिया गया एक खासा(बेठने के लिए) भी वहां रखा गया है


सालाना उर्स में लोग बड़ी तादाद में शामिल होते हैं, कई धार्मिक कार्यक्रम होते हैं।शाम चार बजे नकाश आजाद चौक स्थित हाजी मस्सा पीर से चादर शरीफ का जुलूस दरगाह के सज्जादा नशीन पीर सैयद सदाकत अली जीलानी के दल के साथ रवाना होता है जो नागौर की पीपली गली, हाथी चौक, सदर बाजार होते हुए दरगाह बड़े पीर साहब पहुंचता है वहां चादर चढ़ाकर सज्जादानशीन ने दुआ करवाई।कादरिया सम्प्रदाय की इस प्रसिद्ध दरगाह में कुछ गीतों, कव्वालियों, और कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हुई है।

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