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नागौर

डीडवाना का ऐसा मंदिर जहाँ मंदिर के फर्श से निकलता है अपने आप घी

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मारवाड़ का सिंह द्वार और शेखावटी का तोरण कहलाने वाला डीडवाना अपने आध्यात्मिक ग्रुप में भी समृद्ध रहा है। निरंजनी संप्रदाय और माहेश्वरी समाज का उद्गम स्थल यह डीडवाना बहुत प्राचीन स्थान है। कभी यहां कुषाण साम्राज्य था।कभी कुषाणों की कार्यस्थली रहा यह नगर, तत्कालीन आभानगरी बाद में इसी क्षेत्र के प्रधानमंत्री रहे डीडूशाह ने द्वारा डीडवाना हो गया।हम बात कर रहे इसी डीडवाना में अखाड़ा भाटी का बास में अवस्थित काली माता मंदिर के बारे में।कथा का प्रसंग इस प्रकार है डीडवाना सरस्वती नदी के किनारे पर बसा हुआ था और यहां पर उज्जैन के राजा भरतरी तपस्या करने के लिए आए थे।रात में काली माता के बने मंदिर में तपस्या करते थे।मंदिर में गर्भगृह में लगी आदम कद मूर्ति का अपना एक रहस्य है।

पुजारी जी बताते हैं कि इस मूर्ति के भाव बदलते रहते हैं।कभी आपको एक नन्हीं बच्ची के तो कभी युवा के रूप में,कभी एक वृद्धा के रूप में मिलेंगी। मंदिर स्थापना के बाद में यहां कई संतों ने तपस्या की।विशेष रूप से नाथ संप्रदाय का मंदिर है और उनके वैराग्य पंथ से जुड़ा हुआ है।एक किवदंती यह भी है कि यहां भरतरी और गोपीचंद ने तपस्या की थी और माता से उनका साक्षात्कार हुआ और उस बातचीत के बाद तय हुआ कि वे हर 12 साल बाद मंदिर आएंगे मंदिर परिसर के बाहर एक चबूतरा भी बना हुआ है उसे पुत्र का नाम राजा भरतरी और गोपीचंद के नाम से है।

पुजारी जी बताते हैं कि मंदिर परिसर के बाहर बने एक पीपल के पेड़ के नीचे संत बीका भी हुए। बीका औघड़ पंथी थे उनकू गुरु गोरखनाथ से राब्ता हुआ और उन्होंने उनसे उल्टी भाषा में बातचीत की। फिर उन्होंने उन्हें शिष्य बना दिया। एक मान्यता यह भी है कि बीका ने जब माता के दर्शन किए तो उसके बाद 6 महीने तक अन्न ग्रहण नहीं किया फिर जीवित समा’धि ले ली, जहां अभी पीपल का पेड़ उग रहा है।मंदिर में जनमानस की ग़ज़ब की श्रद्धा है।कायिक, दैहिक और आध्यात्मिक समस्याओं का यहाँ निवारण होता है, ऐसा यहाँ का लोक कहता है।1992 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था।स्थानीय लोगों का कहना कि माता का एक चम’त्कार यह भी देखने योग्य है कि मंदिर के फर्स में घी और भभूती का स्वत: निकलना होता है।

मंदिर परिसर के पास शिव भगवान का मंदिर है।इस मंदिर की स्थापना कोई प्राचीन नहीं है।बकौल पुजारी जी 11 साल पहले बने इस मंदिर के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं।कलात्मक ढंग से निर्मित शिवलिंग को मशहूर शिल्पकार पद्मश्री अर्जून प्रजापत ने बनाया था।पुजारी जी बताते हैं कि पहले यहाँ धूणे हुआ करते थे, अखंड ज्योति नहीं होती थी।और यज्ञ की पंरपरा बहुत प्राचीन समय से रही।पुजारी जी बताते हैं कि हमारे पुरखों से हमने ये सुना कि यहाँ यज्ञकुंडो में लगातार यज्ञ होता रहता था और शायद यही कारण है कि यहाँ फर्स के रास्ते घीनिकलता है।मंदिर के बाहर शांति और साधना के लिए एक भूमिगत स्थल बना हुआ है।मंदिर में उदयनाथ आदिनाथ, शेषनाथ आदि की प्रतिमाएँ बनायी गयी हैं।

मंदिर के बाहर एक नीम का पेड़ है।पुजारी जी एक किस्सा बताते हैं कि उनकी पड़दादी जिनका नाम पुरणी था, इलाके में तंत्र मंत्र की बड़ी जानकारी थी उनके तंत्र-मंत्र के किस्से आसपास में बहुत सुने जाते हैं। एक समय की बात है जब पूरे गांव में टीडी दल ने आक्रमण कर दिया था खेतों में वह 3 दिन की डिलीवरी में थी और उसके गई वहां और टीवी को पूरी कंट्रोल कर के घड़े के अंदर बंद करके और तत्कालीन हाकम अंग्रेज अधिकारी के सामने पेश किया और और अंग्रेज हाकम खुश हो गया था।मंदिर निर्माण के पीछे एक लंबी कथा सुनायी जाती है जिसमें कई बिंदु आश्चर्यजनक हैं तो कहीं शंका से भरे भी।

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