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नागौर

कुचामन के किले में सोने के महल का रहस्य और धूणी बाबा के चम’त्कार की कहानी

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इस दुर्ग के नींव यहां के प्रथम राजा जालम सिंह जी के द्वारा रखी गई थी उसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के सात राजा बने अंतिम जो सातवीं पीढ़ी थी उस राजा का नाम हरि सिंह था।इस दुर्ग की खास बात यह है कि इसपर कभी हम’ला नही हुआ तो’प के द्वारा कभी भी इसे उ’ड़ाने की कोशिश नहीं की गई।इस दुर्ग के अंदर 5 दरवाजे थे।दरवाजे इतनी मजबूत ढंग से बनाए हुए हैं।इनको यु’द्ध के समय इन हाथीयों से तोड़ा जाता था।एक गेट तो हाथी तोड़ सकता था पर दूसरा और तीसरा दरवाजा कुछ इस प्रकार से बना था कि उसके अंदर हाथी प्रवेश भी नहीं कर सकते थे क्योंकि वो घुमावदार रस्ता था।

किले के ऊपर थोड़ा आगे जाते ही लगभग 40 50 फीट गहरा गड्ढा है जो कि हाथी घोड़े व अन्य जानवरों के पानी पीने के लिए काम में लिया जाता था इसमें बारिश के दौरान का ही पानी इकट्ठा हो जाता था।दूर के बाहर लगभग 50 छोटी मोटी दुकानें हैं।रानियों की सुरक्षा के लिहाज से महल के बाहर ही ‘मीना बाजार’ लगाया जाता था ताकि उन्हें महल से बाहर न जाना पड़े और उनके साज-सज्जा आभूषण व अन्य जरूरत के सामान यहीं पर मिल जाए।साल में एक बार रानी भी मीना बाजार लगाया करती थी प्राचीन काल में राजा एक राजा के कई रानीयां हुआ करती थी, रानियां राजा को प्रभावित करने के लिए साल में एक बार मीना बाजार जरूर लगाती।

कोई राजा को पगड़ी भेंट करती, कोई तलवार भेंट करती, कोई अन्य चीजें भेंट करती यह सब चीजें इसलिए भेंट करती ताकि वे राजा का मन मोह सके उन्हें अपनी ओर प्रभावित कर सके।किले के अंदर थोड़ा सा आगे आने पर ‘चीनीपोल’ नामक स्थान आता है।इसका नाम चीनीपोल इसलिए पड़ा क्योंकि जब राजा के कुछ चीनी दोस्त राजा से मिलने आए थे तो पूरे राजस्थान में घूमे और घूमने के दौरान उन्होंने जो कुछ भी देखा महल, मन्दिर, रथ, घोड़ा, गढ़ चूहे आदि।राजा ने उन चीजों को एक छोटा रूप देखकर महल के ऊपर की तरफ बारीक नक्काशी करवा दी।जैसे ही हम किले के अंदर जाते हैं तो वहां एक अंडरग्राउंड स्विमिंग पुल आता है जो कि विशेष रूप से रानियों के लिए बनवाया गया है।

कुचामन शहर के बाहर एक परकोटा बना हुआ था जहां हर जगह एक सै’निक की टु’कड़ी खड़ी रहती थी इसमें क्रमशः पलटन गेट, हौत का दरवाजा, आथूणा दरवाजा गोळती प्याऊ, गणेश डूंगरी आदि।

हर परकोटे पर सुरक्षा की दृष्टि से सैनिक खड़ा होता था।यहां का जो पुराना अस्तबल था उसे अब एक होटल में तब्दील कर दिया गया है जहां पहले घोड़े घोड़ों को बांधने रहने व नहलाने खिलाने का काम किया जाता था।किले में थोड़ा और आगे चलने पर दीवान-ए-खास आती है जहां पर राजा अपने मंत्रियों के साथ बैठक किया करते थे।दीवाने दीवाने खास में पंखा भी लगा हुआ था जिसे हमारी मातृभाषा में ‘बीजणो‘ कहते हैं।उसे दो सैनि’कों द्वारा परस्पर रूप से रस्सियों से खींचा जाता था।ओर उससे हवा आती थी।महल के अंदर यहां के पहले राजा जालमसिंह जी की तस्वीर भी लगी हुई है

एवं उस समय के राजाओं द्वारा बनाई गई पेंटिंग भी वहां पर लगाई हुई है।दीवान-ए-खास की दूसरी मंजिल में रानियां बैठा करती थी उस समय रानिया राजाओं के अलावा सबसे पर्दा रखती थी, तो वे सब ऊपरी मंजिल में बैठ कर बैठक सुनती व राजा द्वारा दिये गए निर्णय भी।कहा जाता है कि यहां पहले के पहाड़ी इलाके के अलावा कुछ नही था बाद में यहां एक धूणी बाबा आये जो की भक्ति करते थे। जब जालमसिंह जी ‘मीठड़ी’ से उठ के यहां आए तो धूणी बाबा ने उन्होंने कहा कि आप यहाँ आकर बस जाईये आपकी सात पीढ़ी राज करेगी और वो बात सही हुई उनकी सात पीढ़ियों ने राज किया और उसके बाद राजतंत्र खत्म हो गया अब आठवीं पीढ़ी में तीन लड़के हैं।महल के एक किनारे पर ‘सूर्यपोल’ नामक जगह है जहां राजा व रानी सूर्य को पहली किरण के साथ प्रणाम करने आया करते थे।

किले में एक हाथी स्टैंड नामक स्थान बना हुआ था जो कि पेड़ीनुमा बना हुआ था यह लगभग 8 फिट ऊंचा है इसपर चढ़कर राजा हाथी पर बैठा करता था।यहां एक जगह पत्थर के गोले पड़े हैं।जब राजा को यह लगता कि किसी दूसरे प्रदेश के राजा ने मुझ पर हम’ला कर दिया है और कहीं से भी बाहर जाने का रास्ता नही है तो राजा महल के अंदर एक खुफिया गुफा से होते हुवे बाहर जाता था।वहां एक बावड़ीनुमा टैं’क से बनाया गया था जो कि दो-तीन साल अकाल पड़ने पर क्षेत्रवासियों को पीने का पानी देने के लिए पर्याप्त था।कुचामन से 10 किलोमीटर दूर जो पांचवा गांव आता है उनके ओर कुचामन के यु’द्ध मे यहां से तो’प चलाये जाने उसे खंडर बना दिया गया।सारे सै’निकों को रहने के लिए महल में एक अलग जगह मिली थी यहां पर ही सारे सैनिक रहते खाते-पीते और नहाते।

किले के एक भाग में गोल्डन महल (Goldan Fort) बना हुआ है इसमें सोने की पॉलिश पर बेहद बारीकी से कारीगरी की गई है जिसमें राजा की दिनचर्या का भी वर्णन है।यह नक्काशी बहुत ही सूक्ष्म अक्षरों में की गई है।महल समुंदर तल से 700 से 800 मीटर ऊंचाई पर है यहां पर तीन झरोखे हैं जो कि गोल्डन महल से देखे जा सकते हैं जो भी महल में घटित होता है वह यहां से एकदम साफ देखा जा सकता है।गोल्डन महल से राजा महल के हर जगह पर देख सकता था कि कौन सैनिक क्या काम कर रहा है वहां बैठे-बैठे पूरे महल पर अच्छे से निगरानी रखी जा सकती थी।कुचामन सिटी (Kuchaman City) महल बनने के बाद बसी थी। राजा जालम सिंह ने 1700 ई. में इस महल की नींव रखी थी उसके बाद यह शहर बसा।यहां एक काली माता का मंदिर (Kali Mata Ka Mandir) भी था जहां रानी आज सुबह शाम आया करती थी वह मंदिर गुफा के रास्ते से आया करती थी ताकि बाहर का उन्हें कोई देखे ना वे पर्दे में रहती थी और गुफा के रास्ते से ही वापस चली जाया करती थी।महल के अंदर एक शिव जी का मंदिर (Shiv Mandir) भी है जहां 11 शिवलिंग है रिद्धि-सिद्धि गणेश जी महाराज व उनका पूरा परिवार सहित स्थापित है राजा में रानी यहां कर पूजा पाठ किया करते थे।

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