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राजस्थान

थार के मशहूर राजस्थानी गीत जो हमारी विरासत,लोक संस्कृति से जुड़े,आपका पसंदीदा गाना कौनसा है ?

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किसी भी क्षेत्र का लोक संगीत क्षेत्र उस क्षेत्र के बाशिंदों के लिए प्राण होता है। लोक संगीत सुनते हुए झूम जाते हैं लोग। कई मांगलिक अवसरों पर उन्हें गाया जाता है।आज हम बात करेंगे राजस्थान के लोकगीतों के बारे में राजस्थान में कई प्रकार के लोक गीत गाए जाते हैं हर जगह मारवाड़ में ढूंढाड़ में, मेवाड़ में वागड़ में। राजस्थान लोक गीतों के मामले में समृद्ध रहा है।लोक का इससे सीधा जुड़ाव है।राजस्थान के कुछ प्रमुख लोकगीत इस भाँति है-

1. कुंरजा:- कुंरजा एक विदेशी पक्षी है, जिसे प्रवासी पंखी कहना ठीक होगा, राजस्थान के बीकानेर और जोधपुर में वह तालाबों पर पानी पीने के लिए आती है।कुंरजा को विरह गीत के रूप में गाया जाता है।राजस्थान में अकाल पड़ते आए हैं, खासकर पश्चिम राजस्थान में जमीनें भी कोई खास काम की नहीं है, इसलिए मुखिया को कमाने के लिए बाहर जाना पड़ता है, पीछे उसकी मिरगानैंणी उसकी बाहट जोहती है।इसी संदर्भ में यह गीत है – “कुंरजा म्होंरी हाला नों पिया जी आळै देस”

2. ओळ्यूं/अवळू:- ओळ्यूं शब्द का हिन्दी अर्थ ही याद है तो जाहिर सी बात है याद के रूप में, एक स्मृति विषयक गीत होगा।घर में रजाई बनाती माँ अपनी बेटी के लिए गाती है, गाती है बेटी आँगन बुहारती अपने भाई को।

3. मूमल:- मूमल गीत का उद्गम छात्र प्रेम कहानी मूमल महिंद्रा से है मोहम्मद लोदूर्वा की रानी थी और महेंद्र अमरकोट का राणा था दोनों के बीच में प्रेम और उसके बाद में शादी हुई और उसकी विरह का जो वर्णन है उसके पीछे की कहानी से संदर्भित होता है इसको दोरागों में गाया जाता है एक राणा राग में ओके अपनी राशि राग में विश्व प्रसिद्ध गायक दप्पू खान ऐसे राणा राग में जाते थे।वे सोनारगढ़ के आगे बैठ राग को भड़ किवाड़ भाटी तक पहुँचाते –

“होंठड़ला मूमल रा सरूप नारेळ ज्यूं
प्यारी प्यारी मूमल!
हाल तो लेजावों भाडळगढ आळै देस!

4. ढोलामारू:- यह ख्यात गीत ढोला-मरवण की कहानी पर बना हुआ है, यह भी विरह का गीत है, सिरोही की तरफ थोड़ा अधिक गाया जाता है।

5. गोरबंध:- गोरबंद ऊंट के गले में डाला में पहनने का आभूषण होता है जो कि बहुत सुंदर बना होता है, इसी संदर्भ में एक सौन्दर्य रूप में इस गीत को गाया जाता है, हालांकि अब इतना नहीं गाया जाता।शेखावाटी की तरफ कुछ ज्यादा ही गाया जाता है।

“लड़ली लूंबा-झूंबा ऐ
म्हारौ गोरबंद नखराळौ
आलीजा………”

6. तेजा:- तेजा मुख्यतः जाट बाहुल्य इलाकों में हल चलाते गाया जाता है, समय हल का रहा नहीं और न ही गवैयों का इसीलिए रिकार्डेड गीत खेतों में अक्सर ट्रैक्टर पर चलते सुनायी देते हैं। नागौर, जोधपुर, पाली आदि में तेज़ा गीत खूब गाया जाता है।

7. पणिहारी :- पणिहारी गीत राजस्थान के लोकगायकों ने खूब गाया है, भिन्न भिन्न राग में।सदीक खान जैसा पणिहारी को गाते हैं वैसा गाया हुआ दुर्लभ है।

“आज रै उतरियै मों धूंधलौ
पणिहारी जी हेलौ….ओ
मोटोडी़ बरसे मेह पणिहारी जी हेलौ!”

8. कांगसियौ :- यह गीत खासकर पश्चिमी राजस्थान में गाया जाता है, इसके कुछ बोल इस भाँति है –

“म्हारै छैल भंवर रो कांगसियौ
पाडौ़सन ले गयी ऐ…….!”

9. झोरावा गीत :- यह वियोग रस का गीत है।जैसलमेर की तरफ खूब गाया जाता है।

10. हिचकी :- हिचकी को याद के रूप में गाया जाता है, किसी की याद आने पर इस गीत का गायन होता है।इस गीत के बोल कुछ यूँ है –

“आवै हिचकी रै बेरण
आवै अवलूडी़ म्हारौ आलीजौ
चितारै बेरण आवै हिचकी”

11. लावणी:- लावणी का मतलब बुलावा है।यह गीत नायिका द्वारा नायक को निमंत्रण पर है।यह भक्ति, सिणगार आदि रस में हो सकता है।मोरध्वज, भरतरि मुख्य लावणियाँ है।

ये मुख्य गीत हैं। कुछ अन्य भी गीत हैं जिनमें करौली क्षेत्र में गाया जाने वाला लांगुरिया गीत प्रसिद्ध है।यह गीत करौली में केला देवी के मेले में उनकी स्मृति में गाया जाता है।बिछूडौ़ गीत भी मुख्य रूप से हमें लोकगीतों की सूची में मिलता है।यह मारवाड़ में कम और हाडौ़ती साइड थोड़ा अधिक गाया जाता है।यूं बच्चे के जन्म पर मारवाड़ में या कहें कि खासकर बाड़मेर-जैसलमेर में हालरिया नाम का गीत गाया जाता है।

इनके अलावा जीरो, चिरमी, अरणी, डोरो, अरणी गणगौर, घुड़ला, बधावा, पावणा, कामण (टोने टोटके) आदि गीत भी गाए जाते हैं।हमारा लोक हमारी विरासत, लोक संस्कृति आदि से जुड़ा रहेगा तो वह जुड़ा रहेगा जडो़ से भी, इसलिए इन गीतों को सुनें, गुने और अपने लोक की प्यारी महक लें। आपका पसंदीदा गाना कौनसा है ?

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