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सवाई माधोपुर

अद्भुत रणथंभौर का किला जो दूर से दिखाई नहीं देता अन्य दुर्ग नं’गे हैं , लेकिन यह बख्तरबंद है

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सवाई माधोपुर से 10-11 किलोमीटर दूर स्थित इस किले के निर्माण के बारे में इतिहास में कई बातें हैं।एक जानकारी के हिसाब यह इलाका कभी चौहान वंश के राजा सपलदक्ष के राज में था।उन्होंने ही इस किले का निर्माण शुरू करवाया था।चौहान शाही परिवार ने इस किले को पूरा किया।पहले इस किले को रणस्तंभ के नाम से जाना जाता था।यह किला कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है।1192 ईस्वी में इस किले पर मुस्लिम शासक मुहम्मद ने कब्जा कर लिया और पृथ्वीराज चौहान तृतीय को हरा दिया। एक यु’द्ध और-1226 ईस्वी में इसी किले पर दिल्ली शासक इल्तुतमिश ने कब्जा कर लिया था। यद्यपि चौहानों ने 1236 में दुबारा से किले पर कब्जा कर लिया।

1259 में बलबन ने कई असफल प्रयासों के बाद जैतसिंह चौहान से किले पर कब्जा कर लिया। फिर 1283 में जैतसिंह चौहान के उत्तराधिकारी देव ने किले को जीत लिया। 1301 में किले को अलाउद्दीन खिलजी ने कब्जा कर लिया था।चौहान वंश के राजा पृथ्वीराज प्रथम का झुकाव जैन धर्म की तरफ बढ़ा, उसी समय जैन संत सिद्ध सेन सूरी ने इस जगह को जैनियों का पवित्र तीर्थ स्थल भी घोषित कर दिया|खानवा के युद्ध में जब राणा सांगा घायल हुए तो उन्होंने इस किले में शरण ली। रणथंभौर दुर्ग से प्रभावित होकर अबुल फजल ने लिखा है कि “अन्य सब दुर्ग नं’गे हैं जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद हैं”।

हम्मीर और रणथंभौर :

हम्मीर का शासन काल 1282 ईस्वी से लेकर 1301 ईस्वी तक रहा और हम्मीर देव के इस 19 वर्ष के शासनकाल के समय रणथम्भौर की ख्याति चारों और फेल गयी। राणा हमीर का शासनकाल रणथंभौर के इतिहास में सबसे प्रसिद्ध शासन काल माना जाता है।ऐतिहासिक जानकारी के मुताबिक हमीर ने अपने जीवन में कुल 17 यु’द्ध किए जिसमें वह तेरह यु’द्ध जीता।1569 में अकबर ने उस समय की आमेर रियासत के राजाओ के साथ मिल कर रणथंभौर पर आक्रमण कर दिया और उस वक़्त रणथंभौर हाडा़ राजाओं के अधीन था, दुर्ग राव सुरजन हाड़ा राजा थे, उनसे सन्धि कर ली।

समय के साथ यह किला और किले के आसपास का क्षेत्र जयपुर के महाराजाओं की पसंदीदा शि’कारस्थ’ली बन गया क्योंकि वन्यजीव बहुत पाये जाते थे यहाँ, 17 वीं शताब्दी में यह किला जयपुर के कछवाहा महाराजाओं के अधीन हो गया और उसके पश्चात यह किला भारत की स्वतंत्रता तक जयपुर रियासत रियासत का हिस्सा बना रहा।माधोसिंह अब यहां के राजा थे, उसी समय उन्होंने इस गांव का नाम बदल कर सवाई माधोपुर कर दिया गया |

964 के बाद से ही ये किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रण में है।2013 में विश्व धरोहर समिति की 37 वीं बैठक के अंदर सवाई माधोपुर के इस किले को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता प्रदान की गई। सघन जंगल के बीच में बना हुआ यह किला आप को तब तक दिखाई नहीं देता जब तक इसके नजदीक नहीं पहुँच जाते | समुद्रतल से इस दुर्ग की ऊंचाई मात्र 1578 फ़ीट है। यहां आने वाले पर्यटक यही सोच कर आते हैं कि यहाँ पहुँच कर उन्हें रणथंभौर वन्यजीव अभ्यारण की जंगल सफारी करनी है।

किले में आप जब प्रवेश करते है तो सबसे पहले आप नौलखा गेट से इस किले में प्रवेश करते है, उस के बाद आप क्रमश: बत्तीस खंबा, अन्नपूर्णा मंदिर, जैन मंदिर, रानी हवेली और राजस्थान के सबसे पुराने गणेश मंदिर जैसी ऐतिहासिक इमारतें देखने को मिलेंगी। इसी किले में राणा हमीर द्वारा निर्मित बादल महल भी बना है हालांकि वह अब जर्जर हो चुका है हमीर देव द्वारा तापित 84 खंभों की छतरी भैया आप देख सकते हैं।जोगी महल, त्रीनेत्र गणेश मंदिर और जैन मंदिर देखने योग्य हैं।

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