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सीकर

आजाद हिन्द फौज के योद्धा स्वतंत्रता सेनानी भोजराज सिंह जी की कहानी, उनके परिवार की जुबानी

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freedom fighter bhojraj singh sikar

देश प्रेम का मोल चुकाना,
पड़ गया सब को भारी।
सुविधा से सब वंचित हो गए,
लड़ें लड़ाई न्यारी।

दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे शहीद स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से रूबरू करवा रहा हूं। जिन्होंने अपने देश की खातिर बहुत यातनाएं सही है। स्वतंत्रता सेनानी (Freedom Fighter) शहीद भोजराज सिंह (Shaheed Bhojraj Singh) भारीजा (Bharija Village) तन दातारामगढ़ (Dantaramgarh) सीकर (Sikar) के परिवार से बातचीत करने पर उनके पुत्र ने बताया कि मेरे पापा पहले अंग्रेजों की फौज में थे। लेकिन जब सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) ने अपनी फौज बनाई तो वो अंग्रेजों की सेना को छोड़कर सुभाष चंद्र बोस की फौज में भर्ती हो गए।

मेरे पापा ने बताया कि उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के साथ रहते हुए अंग्रेजों के साथ बहुत सी लड़ाइयां लड़ी। कुछ समय बाद में वह अंग्रेजो के द्वारा बंदी बना लिए गए। रोज कोड़े खाना, आधे भूखे रहना, पानी के लिए तरसाना, बीडी को भी पीकर मसल देते थे कि कहीं यह पी ना ले । ऐसी अंग्रेजो के द्वारा दी हुई यातनाओं का वह बखान करते थे।

जब देश आजाद हुआ तो उनको दिल्ली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां पर जब मालूम पड़ा कि यह तो देश के लिए लड़ने वाले जांबाज सिपाही हैं। तो उनको बाइज्जत रिहा कर दिया गया। सात साल से घर आए तो उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। सिर में जुएं थी, गांव में किसी ने भी नहीं पहचाना। क्योंकि गांव वालों ने सबने उनको मरा हुआ समझ लिया था।

जब वह यहां आए तो उनकी धर्मपत्नी अपने पियर में थी। उनके मम्मी और पापा अर्थात मेरे दादा और दादी थोड़े दिन बाद ही खत्म हो गए थे। यहां पर आते ही गांव में सीधे माताजी के मंदिर में गए क्योंकि रोज वह माता जी का ही सुमिरन किया करते थे। आने के बाद में सात राजपूत राइ’फल्स में भी भर्ती हो गए थे लेकिन उम्र ज्यादा होने के कारण थोड़े दिन ही नौकरी की तथा उनकी पेंशन नहीं हुई। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी (PM Indira Gandhi) के द्वारा ताम्रपत्र दिया गया था तथा ₹50 पेंशन भी जारी की थी।

इस समय ना तो उनकी पेंशन है। ना कोई राजकीय लाभ मिल पा रहा है। जबकि एक मुरब्बा, घर में एक व्यक्ति को सर्विस, स्कूल का नाम करण शहिद के नाम से, मूर्ति का अनावरण आदि। लेकिन राज की अनदेखी के कारण कुछ भी नहीं हो पा रहा है।

प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री सभी के द्वारा किए गए पत्र व्यवहार में उन्होंने काम को करने को कहां है, लेकिन स्थानीय लेवल पर कुछ भी काम नहीं हो रहा है।स्कूल के नामकरण के विषय में पूरा गांव एकमत है। माननीय भैरू सिंह जी शेखावत उपराष्ट्रपति के समय में मुरब्बा भी अलॉट हो गया था लेकिन उनके जाने के तुरंत बाद वह कार्य भी ठंडे बस्ते में चला गया।

शहीद भोजराज सिंह तो इस दुनिया से विदा ले चुके, लेकिन उनका परिवार उनके नाम के खातिर दर-दर की ठोकरें खा रहा है। वर्तमान सरपंच भी अपनी अटकलों से बात को टाल गए, जबकि आज उस परिवार के पास में पीने का पानी भी नहीं है। उनको किसी प्रकार की राजकीय सहायता आज तक प्राप्त नहीं हुई है यह सोचने वाली बात है।

अपने विचार।
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देश का रक्षक फिरे भटकता,
यह तो नाइंसाफी है।
राज काज में बाधा डाले,
उसको ना कोई माफी है।

विद्याधर तेतरवाल।
मोतीसर।

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