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सीकर

दाऊजी धाम मंदिर का अनोखा मंदिर जहाँ महाराज जी ने बुखार को उतार गुदड़ी में रखा तो हिलने लगी रजाई

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dauji dham mandir sikar

ना कोई गर्व गुमान है, ना कोई हेरा फेरी।
सत्कर्म की गाथा है यह, ना कोई तेरा मेरी।

दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे संत महात्मा की कहानी बताने जा रहा हूं। जिनकी जीवनी चमत्कारों से भरी हुई है। नीमकाथाना (Neem Ka Thana) के पास में कालाकोटा नामक स्थान पर एक दाऊजी धाम (Dauji Dham) है। जिनकी स्थापना को 453 वर्ष हो गए हैं। वहां पर गद्दी पर विराजमान संत श्री ने बताया कि आज से 453 साल पहले यहां संतश्री ध्यान जी महाराज विचरण करते हुए पधारे थे।

ध्यान जी महाराज की एक बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वह जहां भी अपना धुना लगाते थे। वहां पर पानी अपने आप प्रकट हो जाता था। वह गुफाओं में रहना ही पसंद करते थे। वह जिस जगह आकर रुके उस जगह की भौगोलिक स्थिति को जब देखा तो मालूम पड़ा कि यह तो अरावली पर्वत श्रृंखला के अंचल में राजस्थान का प्रयागराज है।

जिस प्रकार उत्तराखंड (Uttarakhand) में सात प्रयाग राज है। उसी प्रकार यहां पर तीन नदियों के संगम पर एक गुफा थी। वहां पर एक दशक का पेड़ था। जिसके नीचे आकर ध्यान जी महाराज ने अपना धुना लगाया था। वह दाऊजी धाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

एक अद्भुत घटना का जिक्र करते हुए महाराज जी ने बताया कि सबसे पहले यहां पर जेतपुरा का धर्मा गुर्जर महाराज जी के पास में आने लगा। सुबह शाम महाराज जी की बातें सुनकर धर्मा गुर्जर अपने आप को प्रसन्न महसूस करने लगा। उनके प्रवचनों से प्रभावित हो गया। जब भी धर्मा रात को लेट होता तो महाराज जी को चिंता होने लगती, कि क्या बात है धर्मा नहीं आया अभी तक।

एक दिन धर्मा गुर्जर थोड़ा लेट हो गया तो महाराज जी ने मृग का रूप धारण कर सामने देखने को चले गए। धर्मा के साथ उसका कुत्ता भी रोज आता था। कुत्ते ने जब मृग को देखा तो वह उसके पीछे दौड़ा। महाराज जी ने थोड़ी दौड़ लगाकर अपना रूप बदला, तब तक पैर में काफी कांटे चुभ गए थे।धर्मा के आने से पहले ही महाराज जी आसन पर आकर बैठ गए,और कांटे निकालने लगे। धर्मा ने महाराज जी को कांटो के बारे में पूछा कि आप कहां चले गए थे। तो काफी जिद्द करने पर महाराज जी ने एक ही बात बताइ कि कुत्ता साथ में मत लाया करो।तब धर्मा सब कुछ समझ गया था।

आस-पास के गांव के लोगों में महाराज जी के प्रति बहुत बड़ी आस्था बन गई थी। एक अन्य दिन की घटना के बारे में बताते हुए संत श्री कहते हैं कि एक औरत का बच्चा खत्म हो गया था। उसने अपने मरे हुए बच्चे को लाकर महाराज जी के चरणों में रख दिया। महाराज जी ने कहा कि इस मिट्टी को मेरे पैरों में क्यों ला कर रखा है। लेकिन चलो कोई बात नहीं। आप इसको अपना दूध पिलाओ, और जैसे ही उसने अपना दूध पिलाया बच्चा जिंदा हो गया।

इस प्रकार की घटनाओं को सुनकर पांडव वंशी पाटन नरेश ने महाराज जी से मिलने की इच्छा जाहिर की। एक दिन शिकार खेलने के बहाने वह महाराज जी के पास में आ गए। उस समय महाराज जी को बहुत जबरदस्त बुखार था। जब संत श्री को मालूम पड़ा कि पाटन नरेश मिलने के लिए आए हैं। तो उन्होंने अपनी बुखार को उतारकर रजाई के अंदर रख दिया।

जब संत श्री पाटन नरेश से बात कर रहे थे। उस समय पाटन नरेश का पूरा ध्यान रजाई के अंदर उछल रही बुखार के ऊपर था। बुखार जोर जोर से उछल रही थी। जब उन्होंने पूछा है कि यह क्या है, तो उन्होंने नहीं बताना चाहा लेकिन काफी देर के बाद में सारी बातें साफ हो गई, और बताना पड़ा कि यह बुखार है। पाटन नरेश की जिद पर संत श्री ने बुखार को फिर से चढ़ा कर दिखाया और फिर उतार कर रख दिया।

इस बात से प्रभावित होकर पाटन नरेश ने चौथी बार संवत 2023 में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और 101 बीघा जमीन दान में दी। यहां एक मान्यता और भी है कि बेल्ट की नौकरी करने वाले चाहे पुलिस वाले हो, या फौजी हो उनकी हर मनोकामना यहां पर पूरी होती है। वर्तमान में जो संत श्री गद्दी पर बैठे हैं उनका कहना है कि हम तो केवल हर रोज एक हजार आहुतियां गाय के घी की देते हैं।

हमको मालूम नहीं कि यहां लोगों का काम किस प्रकार सिद्ध होता है। कौन सी शक्ति करती है हम कुछ भी नहीं जानते। हम हमारा नित्य कार्य करने में लीन रहते हैं। लोगों का सबका काम श्रद्धा पूर्वक मान्यता के अनुसार यहां पर सिद्ध होता है।

” जय झलको _ जय राजस्थान।”

अपने विचार।
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कुछ नहीं होगा,
होगा वह रुकेगा नहीं।
सत मार्ग पर चलते रहो,
तुम्हारा जमीर झुकेगा नहीं

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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