सीकर के हव. सुभाष चंद्र कोटडा जिसके पराक्रम से पाकिस्तान भी गया था कांप, पढ़ें पूरी कहानी

Hawaldar Subhash Chanda Kotda: हव. सुभाष चंद्र कोटडा नीमका थाना, सीकर।
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हाथ कटे या पैर कटे,
जज्बा कम नहीं होता है।
दर्रा, घाटी हो चाहे पहाड़ी,
चाहे जब वह सोता है।

एक फौजी का दमदार इंटरव्यू।
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दोस्तों नमस्कार!
दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे फौजी से रूबरू करवा रहा हूं,जिसने कारगिल के युद्ध (Kargil War) में दुश्मनों को नाकों चने चबाते हुए, जिस प्रकार अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया और लड़ाई लड़ी उसके बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है।

परिवार और परिचय।
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सीकर (Sikar) जिले के नीम का थाना तहसील के कोटड़ा निवासी सुभाष चंद्र (Subhash Chandra) ने हमारे संवाददाता कुलदीप से बात करते हुए बताया कि मैं 1984 में भर्ती हुआ था तथा मेरा सेंटर आगरा (Agra) में था। जिसके लिए मैं ट्रेनिंग के लिए जोधपुर टेन पैरा कमांडो में गया। अपनी शिक्षा से संबंधित बातें करते हुए सुभाष चंद्र ने बताया कि मैंने नीमकाथाना (Neem ka thana) से सीनियर सेकेंडरी (Senior Secondary) पास करते ही फौज में चला गया। उस समय मेरे पिताजी खेती का काम करते थे, और कोई दूसरा कमाने वाला नहीं था।
उन्होंने बताया कि हमारा जीवन यापन गरीबी में ही हो रहा था।फौज की तैयारी के बारे में उन्होंने बताया कि खेतों में दौड़ कर प्रैक्टिस की तथा उस समय सड़क भी नहीं थी।

कारगिल युद्ध- Kargil yudh।
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फौज की सेवा के दौरान आपने कौन सी लड़ाई लड़ी,के जवाब में सुभाषचंद्र (Subhash Chandra) कहते हैं कि मैंने 1999 में कारगिल युद्ध।जिसको ऑपरेशन विजय के नाम से जाना जाता है में मैंने भाग लिया था। मेरी यूनिट को एक टास्क, जिसमें 16000 फीट की ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना था। यह चढ़ाई रात को करनी थी, जहां पहाड़ी पर पाकिस्तान के जवान छिपे हुए थे। मेरे पैर में गोली लगी और हमारी यूनिट के पांच जवान शहीद हो गए।
सुभाष चंद्र कहते है कि मैं प्लाटून हालदार था। मेरे ऊपर एक कमांडर थे। मेरे सामने मेरा एक शिष्य, सुरेंद्र सिंह शेखावत के पेट में गोली लगी, जो हाथ की हाथ खत्म हो गया। मेरे पैर में गोली लगी जिससे घुटने से नीचे पैर काटना पड़ा।
आपके सामने ही आपका शिष्य खत्म हो गया, तो आपके उपर क्या फर्क पड़ा। इसके जवाब में वह कहते हैं कि हमारी बटालियन में 21 जवान थे।जिसमें मैं सेकंड हेड था उस वक्त चाहे कुछ भी हो जाए, हमको हताश नहीं होना है। दुश्मन से बराबर लोहा लेना है। यह हमारा जुनून होता है। इस तरह का जज्बा और जुनून जवान के अंदर ट्रेनिंग में ही भर दिया जाता है।
उस समय 48 घंटे तक लगातार पहाड़ी के ऊपर युद्ध चलता रहा। मेरे सहित पांच जवान घायल अवस्था में थे, और पांच जवान शहीद हो गए थे। लेकिन घायल भी बराबर दुश्मन से लोहा ले रहे थे।

आप का इलाज कहां हुआ।
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बर्फ की पहाड़ी पर 48 घंटे रहने के बाद में कमांडर के आदेशानुसार पैर घसीटते घसीटते मैं नीचे आ गया। बाद में लेह, लद्दाख, चंडीगढ़, दिल्ली, जोधपुर अनेक स्थानों पर मेरा बराबर इलाज चलता रहा व मैं हॉस्पिटल में भर्ती रहा। घुटने के नीचे मुझे आर्टिफिशियल पैर लगाया गया। फौज में जवान को सोचने का मौका नहीं मिलता है। सुबह 4:00 बजे से लेकर रात को 9:0 बजे तक उसकी पीटी, परेड, क्लास, दौड़ आदि चलते ही रहते हैं।
सुभाष चंद्र कहते हैं कि मैंने तीन साल शांति सेना में, श्रीलंका में भी लड़ाई लड़ी है। श्रीलंका में हमारी शांति सेना जब जाफना  (Jafna)पहुंची,तो उस समय हम एक बार चार दिन बहुत बुरे फंस गए थे। उसमें हमारे जवान भी शहीद हुए थे हमारा अन्वेषण भी खत्म हो गया था, लेकिन वह बुरा समय भी निकला। एक बार कारगिल में 48 घंटे तक खाना पीना सब बंद हो गया था। बोतल में पानी जम गया था। आंखें सूज गई थी, तो वह समय हमारा बहुत खराब निकला।

अन्य।
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कारगिल युद्ध के बाद में जब मेरा पैर कट गया था। तो सन 2000 में मैं पेंशन आ गया। कारगिल युद्ध में मैंने अपने आप को शहीद मान लिया था। मां को याद कर लिया था। क्योंकि व्यक्ति अंत समय में केवल मां को याद करता है लेकिन ईश्वर को कुछ और मंजूर था, और आज आप के बीच में बैठा हूं। Hawaldar Subhash Chanda Kotda

अपने विचार। 
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जज्बा रखो जंग सा,
हर काम करो जुनून से।
जीना मरना ईश्वर देखें,
जीवन कटेगा सकून से।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

सीकर के श्रीमाधोपुर में स्थापित बालाजी धाम की बेहद अनोखी है कथा, हुए हैं कई चमत्कार!

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