बिना अध्यापक और लालटेन की रोशनी में पढ़ कर गाँव से निकला आईपीएस, अरशद अली के जज्बे की कहानी

मन में जज्बा पढ़ने का, तो गांव वाला भी अंग्रेज है।
बिना अध्यापक रोशनी के, लालटेन भी हाई वोल्टेज है।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करवा रहा हूं। जिसने दसवीं क्लास में बिना अंग्रेजी के अध्यापक के मेरिट में स्थान बनाया। और गांव के परिवेश में रहकर लालटेन की रोशनी में एक साथ में चार बड़ी नौकरियों को छू लिया।

दीप से बात करते हुए अरशद अली ने अपने संघर्ष की कहानी अपने शब्दों में बताते हुए कहा कि ठेठ ग्रामीण परिवेश में रहकर प्राइमरी तथा माध्यमिक विद्यालय तक पढ़ाई की। मेरे परिवार में सबसे पहले पढ़ाई की शुरुआत करने वाला मैं ही हूं। मैं हमेशा से गांव और किसानी से जुड़ा हुआ रहा हूं।वर्तमान में मेरी पोस्टिंग डीसीपी (DCP) जयपुर कमिश्नरेट (Jaipur Commissionerate) में है।

IPS अरशद अली (IPS Arshad Ali) ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब मेरी 10वीं की एग्जाम थी, तो मेरा परीक्षा सेंटर फतेहपुर (Fatehpur) में आया था। वहां पर कैसे जैसे रहने की व्यवस्था करके एक महीने पहले रहना शुरू किया। अंग्रेजी और मैथ्स का अध्यापक नहीं होने की वजह से हमारी क्लास के 22 में से तीन बच्चे पास हुए। लेकिन मेरे अंग्रेजी में सौ में से 78 और मैथ्स में 50 में से 46 नंबर आए। क्योंकि मुझे जो सब्जेक्ट हार्ड लगता है, उसके पीछे पड़ जाता हूं, चाहे कुछ भी करना पड़े। उसी वजह से 10वीं की बोर्ड मेरिट में मेरा 18 वा नंबर था।

वह कहते हैं कि मैं दसवीं तक तीन किलो मीटर स्कूल जाना और तीन किलोमीटर वापस आना ।इसके अलावा खेती का काम तथा कभी कभी दूध भी देने के लिए जाना पड़ता था।।तो मेरा बच्चों से अनुरोध है कि आप अपने कार्य के प्रति जुनून पैदा करो। किसी भी चीज का बहाना मत बनाओ। यह रोजमर्रा की जिंदगी के कुछ काम भी साथ में करने ही पड़ते हैं।

आईपीएस (IPS) कैसे बने।
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दीप से बात करते हुए अरशद अली साहब कहते हैं कि जब मैं मुकुंदगढ़ कॉलेज (Mukundgarh College) में पढ़ता था,तो हमारे एक मैडम थी,जो r.a.s. बनी। तब उस समय उनकी बहुत आवभगत हुई थी। तब मैंने मैडम से पूछा कि आप क्या बन गई, और क्या हम भी बन सकते हैं क्या। तब मैडम ने विस्तार से सारी बातें बताई।

वह कहते हैं कि मैं उस समय फर्स्ट ईयर में था। और ग्रेजुएशन करने के साथ-साथ मैंने मैडम के बताए हुए सिलेबस का पूरा अध्ययन कर लिया था। उसके बाद में घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से किसी के बताये अनुसार अलीगढ़ यूनिवर्सिटी (Aligarh University) में चला गया। जहां पर मुझे फ्री ऑफ कॉस्ट पढ़ने का मौका मिल गया। अर्थात जितना खर्चा होता, उतनी स्कॉलरशिप मिल जाती थी।

वहां पर मैंने निर्णय किया कि मैं तो आईपीएस (IPS) भी बन सकता हूं। क्योंकि वहां का मैं गोल्ड मेडलिस्ट (Gold Medalist) रहा हूं। नेट भी क्लियर कर चुका था। यूपीएससी भी पास कर ली, और राजस्थान (Rajasthan) में आरएएस (RAS) का एग्जाम भी क्लियर कर लिया था।जब मैंने एमए किया और रिजल्ट आया तो मेरे पास में चार ऑप्शन एक साथ थे। उन्होंने बताया कि डायरेक्ट मेरा आरपीएस में सिलेक्शन हुआ और बाद में मैं आई पी एस बना ।

वह कहते हैं कि व्यक्ति अभाव में भी अपने सपने पूरे कर सकता है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आगे बढ़ने के लिए आर्थिक स्थिति का बहाना बेकार है। मैंने ट्यूशन किया, कविता भी लिखी, डिबेट में भी भाग लिया है। वह सब मेरी आर्थिक स्थिति के ऊपर ही था। इसलिए मैं कहता हूंकि आगे बढ़ने के लिए आर्थिक स्थिति बाधा नहीं बन सकती।

अन्य।
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वह कहते कि आज हर लड़का हर एक सुविधा से लैस है। लेकिन हमको कॉलेज में साइकिल मिली थी, वह भी सेकंड हैंड। अर्थात मैं सेल्फ मेड हूं। इसी प्रकार हर व्यक्ति को इसी जज्बे के साथ में आगे बढ़ना चाहिए।

वो कहते हैं कि आर्ट का स्टूडेंट होने के बावजूद कंप्यूटर की पूर्ण टेक्नोलॉजी की जानकारी, साइबर क्राइम, जो आज आईटी का लड़का कर सकता है। वह मैं भी कर सकता हूं। यह एक जुनून है। बच्चों को सफलता के टिप्स बताते हुए अरशद अली साहब कहते हैं कि एक रोड मैप बनाकर, कड़ी मेहनत, सही दृष्टिकोण व मेहनत के द्वारा आप किसी भी मंजिल को पा सकते हैं।

अपने विचार।
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पहले सोचो और रोड मैप बनाओ,
उसमें मेहनत और समय मिलाओ।
फिर उसका रिजल्ट देखो,
खुद देखो और दुनिया को दिखाओ।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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