Connect with us

सीकर

सीकर को बचाने के लिए बनाया गया लक्ष्मणगढ़ का किला, अद्भुत रह’स्य और कहानी

Published

on

सीकर से सड़क के रास्ते जब बीकानेर जाते हैं तो बीच में एक कस्बा आता है लक्ष्मणगढ़ आप यदि ध्यान से देखेंगे तो इस कस्बे में बीचोबीच एक किला अवस्थित है।किला ज्यादा प्राचीन नहीं है।किले का निर्माण 1805 में शुरू हुआ था और दो साल में, मतलब कि 1807 में बनकर तैयार हो गया था।लोक में फैली बात यह है एकबार राव राजा लक्ष्मण सिंह फतेहपुर से लौट रहे थे, तो उन्होंने आराम करने के लिए पहाड़ियों का रास्ता चुना। तभी, एक भया’नक घटना घटी। एक भेड़िये ने एक नवजात मेमने पर हम’ला करने की कोशिश की। लेकिन भेड़ की मां ने ने अपनी हिम्मत दिखाई, लड़ाई के अंत में, भेड़िया के पास प्रार्थना के बिना छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। इस घटना ने राव राजा लक्ष्मण सिंह को इस तलहटी में एक किले के निर्माण के लिए प्रेरित किया। वह और उनके लोग इस स्थान को बहादुर या ‘वीर भूमि’ मानते थे।यह इलाक़ा पहले बेरगांव कहलाता था।

क्षेत्र जाट बाहुल्य था, मील जाटों का राज था, उनकी राजधानी यही थी।इतिहास कहता है कि कानसिंह सालेढी़ ने सीकर को घेर लिया था, इसलिए सीकर को सुरक्षा देने के लिए राजा राव लक्ष्मणसिंह ने इस किले का निर्माण करवाया।यह किलों में सबसे नया किला है। इस किले का अपना क्षेत्रीय महत्व था, आसपास चूरू, फतेहपुर, खेतडी़ आदि राजस्थल थे, हमले की आशंकायें रहती थी।ऐसे में यह किला बहुत कारगर साबित हुआ।1882 में हुए आक्र’मण में यहाँ से नेतृत्व राजा बख्तावर सिंह ने किया था।यहीं डूंगजी जवाहर जी ने मदद की थी,यहीं हुआ था उनका नाम इतिहास में दर्ज।

किले में बिजली , कड़क और भवानी नामक तीन शक्तिशाली तो’पें थीं, जो दुश्मनों को हराने में मदद करती थीं। भारत में आजादी के बाद, इन तो’पों को ले जाया गया था।जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तो सीकर के शासक राव राजा कल्याण सिंह ने भारतीय संघ के साथ एकजुट होने का फैसला किया। और इसका परिणाम यह रहा कि सभी राजस्व रोक दिए गए। शासकों को केवल पेंशन प्रदान की जाती थी। यह राशि राव राजाओं की शानदार जीवन शैली का सामना करने के लिए बहुत कम थी और राव राजाओं ने अपनी संपत्ति बेचने का फैसला किया।यह सब सोचते हुए लक्ष्मणगढ़ किला श्री रामनिवासजी झुनझुनवाला के परिवार को राव राजा कल्याण सिंह के द्वारा वर्ष 1960 में बेच दिया गया।

किला 300 फीप ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है।किले में मजबूत पत्थरों का प्रयोग किया गया है।जो पत्थर यहां लगाए गए हैं वे पत्थर केवल राजस्थान के गोपालनपुरा के डोंगरी में पाए जाते हैं।किले में उसके जोन की दीवारें 23 मीनारों से बनी हुई हैं। लंबाई में 4 फीट और चौड़ाई में 20 फीट है।मूल द्वार एक गोमुख शैली में बना हुआ है जो बहुत ही अटूट है। इसके अलावा दरवाजे के प्रवेश मार्ग पर प्रेस नाखूनों का उपयोग किया गया है। कहा जाता है कि ये प्रवेश मार्ग खेड़ी से प्राप्त हुए थे।

23 सीढ़ियों पर चढ़ने के मद्देनजर, चौकी के लिए मुख्य द्वार आता है। इसे सिंहद्वार के रूप में जाना जाता है जो कि मुख्य द्वार है।एक और 47 सीढ़ियाँ आपको गढ़ के अंदर ले जाती हैं। इसके अतिरिक्त गढ़ में दो प्यारे ‘झरोखे’ हैं।8 इन ठोस मीनारों ने अतीत में कई हम’ला’वरों को दुर्बल किया है। किले के वास्तुकारों ने एक अत्यंत कुशलता हासिल किए गए मार्ग के एक हिस्से के रूप में इस मुकदमे का उपयोग किया है। किले के अंदर बनाए गए 25 फीट गहरे पानी के छह विशाल टैं’क हैं। उन्हें पूरे युद्धकाल में पानी के भंडार के रूप में विकसित किया गया था। किले में कई सुरंगें हैं, जो आपातकाल के दौरान सुरक्षित रूप से बाहर निकलने के लिए अपने रूप में कार्य करती हैं।

Continue Reading
Advertisement
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

   
    >