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सीकर

भारतीय फौज में भर्ती होकर अर्जुन अवार्ड तक का सफर तय करने वाले सीकर के घुड़सवार की कहानी

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Muhammad Khan equestria

देश-विदेश में डंका बजाया, घर में आकर हार गया।
भ्रष्टाचार ने हक को खाया, अब देने से इनकार किया।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करवा रहा हूं। जिसने घुड़सवारी में अर्जुन अवार्ड (Arjun Award) प्राप्त कर देश और सीकर जिले का नाम रोशन किया है।

परिचय और परिवार।
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मैं आपको सीकर (Sikar) जिले के फतेहपुर तहसील (Fatehpur Tehsil) में आने वाले भींचरी गांव (Bhinchri Village) में ले चलता हूं। जहां पर श्रीमान खान मोहम्मद खान (Khan Mohammed Khan) ने महेंद्र से बात करते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने फौज में भर्ती होकर अर्जुन अवार्ड तक का सफर तय किया है। उन्होंने 1976 में अर्जुन अवार्ड प्राप्त कर देश का और जिले का नाम रोशन किया था।

उन्होंने बताया कि मेरे वालिद फौज में बॉडी गार्ड थे। मेरी खेल में और घुड़सवारी में बहुत रुचि थी।तो उसी माध्यम से मैं भी फौज में भर्ती हो गया। मैं सर्व प्रथम 1966 में दिल्ली (Delhi) गया, और फिर वहीं से इटली चला गया। उन्होंने बताया कि इटली में मुझे बहुत बढ़िया कोच मिला और मुझे घुड़सवारी (Ghudsawari) के बहुत से गुर सिखाए और घुड़सवारी का मैं मास्टर बन गया।

उसके बाद में पांच साल तक ओमान की राष्ट्रीय टीम का मैं कोच रहा। मुझे वहां किसी प्रकार का अन्य भत्ता नहीं मिलता था। जो वेतन मुझे भारत सरकार देती थी वही मेरा वेतन था।

नौकरी।
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श्रीमान खान साहब ने बताया कि मैं खेल के माध्यम से 1966 के अंदर नौकरी लगा था। उसके बाद में देश विदेश के अंदर अनेक प्रतियोगिताओ में भाग लिया और अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। मुझे इतना बड़ा सम्मान मिलने के बाद में भी मेरी फौज की पेंशन के अलावा कुछ भी लाभ नहीं मिला है।

उन्होंने बताया कि फौज में जाने से पहले भी मेरे पास घोड़ी थी। जिस पर मैं घुड़सवारी करता था। उसी घुड़सवारी के माध्यम से अर्जुन अवार्ड तक पहुंचा। घुड़सवारी का शोक हमारे पूरे खानदान को है। चार पीढ़ी से हमारे घर में घुड़सवारी की जा रही है।

कब कब सम्मानित हुए।
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श्रीमान खान ने बताया कि मुझे घुड़सवारी में 1976 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया था। उस सम्मान के अलावा मुझे गंगानगर (Ganganagar) नहर के समीप एक 25 बीघा का मुरब्बा भी आवंटित किया गया था। लेकिन मुझे बहुत खेद के साथ बताना पड़ रहा है कि मुझे वह जमीन आज तक नहीं मिली।

अन्य।
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उन्होंने बताया कि वे 1980 के ओलंपिक खेलों में भी भाग ले चुके। उन्होंने अपने मेडल्स भी दिखाए हैं। उन्होंने दो बार युद्ध में भाग लेने का जिक्र किया,और विदेशों में तथा देश में मिले हुए सारे मेडल भी दिखाएं।

अपने विचार।
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खेत किसानी और खिलाड़ी,
सरकार की अमानत है।
इनके साथ धोखा करने की,
ना ही कोई जमानत है।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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