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सीकर

राजस्थानी बेटी संतोष देवी की जिंदादिल कहानी, पेश की संस्कृति को जिंदा रखने की अनूठी पहल

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दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी दास्तान सुना रहा हूं जिसमें एक ग्रहणी अपनी गृहस्थी में तिहरा रोल निभा रही है। अपनी संस्कृति को मायड़ भाषा में गीतों के द्वारा सभी को लाभान्वित करते हुए कहती है कि स्कूलों में भी यदि राजस्थानी भाषा का एक अध्याय हो तो यह संस्कृति जिंदा रह सकती है। संतोष देवी राजकीय सेवा में अध्यापिका का कार्य करते हुए अपनी मातृभाषा को बहुत उच्च स्थान देते हुए कहती है कि मुझे किसी शादी समारोह में या रातीजुगा में डीजे का बढ़ता हुआ प्रभाव अच्छा नहीं लगता है। यह हमारी संस्कृति के लिए और हमारी सादगी भरे परिवेश में गंदा रोल अदा कर रहा है।

संतोष देवी

गीतों के प्रति आपका प्रेम कैसे हुआ :

गीतों के प्रति प्रेम के बारे में पूछने पर संतोष देवी कहती है कि मेरा ननिहाल सीकर के पास रामपुरा है।मेरा बचपन मेरे नाना नानी के घर पर गुजरा था। मेरी नानी जी हमारी संस्कृति के गीतों की भंडार थी। हर उत्सव के गीत मेरी नानी जी को आते थे, और मेरी नानी जी जहां भी गीत गाने को जाती थी, मैं ज़बरदस्ती उनके साथ चली जाती थी। मेरे नाना जी भी बहुत ही ज्ञानवान व्यक्ति थे। वो हर काम को बहुत ही सूझबूझ के साथ करने वाले व्यक्ति थे।

संतोष देवी

पहले जब कोई गीत गाकर मांगने के लिए आता था, वो व्यक्ति बहुत ही स्वाभिमानी होते थे। बिना गीत गाए किसी से कोई दान दक्षिणा नहीं लेते थे। मैं बहुत ध्यान लगा कर उस व्यक्ति के गीत सुनती रहती थी और यह सोचती कि नानी कुछ देर से उनको दक्षिणा दे तो इनका पूरा गीत सुनू। मेरी मां को भी बहुत ज्यादा गीत आते थे, और मेरी मां की बहुत इच्छा थी कि इस गीतों की संस्कृति को कोई आगे तक ले जाए।मेरी मां का स्वर्गवास पिछले साल हो गया था। हम चार बहनों में से केवल मैं ही गीतों को संजोकर रखती हूं, और हर उत्सव या शादी समारोह में भाग लेकर इस संस्कृति को बचाने में मेरी भूमिका अदा करती हूं।

अब मेरी ससुराल में भी मेरी सासू मां ने किसी उत्सव वगैरह में जाना बंद कर दिया, तो मैं ही सभी जगह जाती हूं, और अपना अध्यापिका होने का कोई एहसास नहीं होने देती हूं। कौन सा गीत किस जगह गाना है यह मेरे को बचपन में ही ज्ञान हो गया था। अपने लोक देवता का गीत गाकर संतोष देवी अपनी सुरीली राग सुनाती है।

अब कैसे गीत चल रहे हैं : 

इस समय डीजे पर दो अर्थ वाले गीत हमारी इस युवा पीढ़ी को भ्रमित कर रहे है। अर्थात बिगाड़ने की कोशिश कर रहे है। जो बहुत गलत है। लड़कियां शराब के गीत पर इस प्रकार डांस करती है, जैसे वह पीती हो और कुछ लड़के गलत तरीके से डांस करके आज की संस्कृति को बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हमारी ढाणी में मेरी देवरानी, जेठानी, चाची सास आदि मेरे से भी सुंदर गीत गाती है, लेकिन जो व्यक्ति जैसा गीत सुनना चाहता है, उसको वैसे ही गीत पसंद आते हैं।

औरत को एक चीज मानकर गीत गाए जाते हैं। जो औरत के लिए एक गाली है और उसका अपमान है। यदि किसी को समझाने की कोशिश करते हैं तो कहते हैं कि यह पुराने लोग हैं। औरतों के गीतो को पढ़े लिखे लोग भी गंभीरता से नहीं लेते हैं। जबकि इनके एक-एक शब्द को यदि गहराई से आप सुनोगे और समझोगे तो आपको मालूम पड़ेगा कि किस तरह यह गीत उपयोगी है।

फसल काटने का गीत। :

संतोष देवी अपनी ग्रामीण वेशभूषा में और अपनी मातृभाषा में अपनी संस्कृति को बहुत ही सुंदर तरीके से संजोते हुए कहती है कि फसल काटने का एक अलग गीत है। मेरे कुछ कुछ याद है जो इस प्रकार है,,,,,, भोम तलाव बि पर भोम छतरी, बिनजारा की बालद आय उतरी। बेच लून बताव मिश्री।

इस प्रकार के गीत मस्ती भरे, जोश भरने वाले लावणी के समय गाए जाते हैं। हमारे दादा दादी के पुराने गीतों को इन म्यूजिकल कंपनी वालों ने तोड़ मरोड़ कर गाना शुरू कर दिया है जिससे हमारी संस्कृति को बहुत धक्का लगा है।

हमारी संस्कृति कैसे बच सकती है :

संतोष देवीइसका जवाब देते हुए संतोष देवी कहती है कि खुशबू आपका प्रयास बहुत अच्छा चल रहा है। जो हमारी भाषा में आप चैनल बना रहे हो, इसके लिए झलको राजस्थान का योगदान प्रशंसनीय है। हमारी मरुधरा की खुशबू देश विदेश तक फैले इसके लिए आपका प्रयास प्रशंसनीय है। आपके चैनल की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है यह अच्छा संकेत है।

संतोष देवी एक किस्सा सुनाते हुए कहती है कि जब मैं b.Ed कॉलेज अजमेर में पढ़ रही थी, तो हमारे अध्यापक केरल के थे। वह एक किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि एक किसान का लड़का अमेरिका पढ़ने के लिए गया, और वापस आया तो उसने अंग्रेजी बोलनी शुरू कर दी। तो मां ने कहा कि तू मेरा बेटा नहीं हो सकता। जो मायड भाषा भूल गया वह मेरा बेटा नहीं हो सकता।

इसलिए दूध के साथ में जो भाषा सीखी है, उसमें संप्रेषण अच्छा है। उसमें प्यार भरा हुआ है, और उसको छोड़कर हम अपने बुजुर्गों का अपमान कर रहे हैं। संतोष देवी कहती हैं कि राजस्थानी लोक कथा और अपनी भाषा के महत्व को समझने के लिए राजस्थान सरकार को एक पुस्तिका हिंदी की राजस्थानी भाषा में रखनी चाहिए। सभी कवियों से अनुरोध किया है कि वह अपने गीतों को अपनी भाषा के अंदर सुंदर तरीके से पेश करें जिससे हमारी संस्कृति बची रहे। एक गीत गाकर संतोष देवी कहती है कि इसमें एक नारी अपने बालों का बखान करते हुए कहती है,,,,,,,

नारी- मैं तो घाल चट्टीलो बागा में गई,2 बागा में कालो नाग रे। मेरो कालो चटीलो रेशम को। पुरुष_छोरी भाग सके तो भाग ले,2 डस जावो कालो नाग रे , तेरो कालो चटीलो रेशम को।

विश्व विख्यात राजस्थानी गीत जो हर उत्सव पर गाया जाता है “पीपली” की चार लाइने सुनाते हुए,,,,

बाय चला जी भंवर जी बाजरी जी, हांजी वो ढोला बढ़ गई नो नो ताल। काटन री रुत चाल्या चाकरी जी। हांजी वो म्हारी सास सपूती रा पुत, मतना सीधारो पूरब की नौकरी जी।

पहले खेती को महत्व देते हुए कवि ने यह शब्द कहे थे लेकिन आज तो “नौकरी नहीं तो छोकरी नहीं”। हमारी पुरानी संस्कृति को याद करते हुए संतोष देवी कहती है की पुराने गहनों के नाम भी भूल गए। आजकल दुकान पर जाते हैं अच्छा लगा ले आते हैं। लेकिन पहले नेवरी, टड्डा, आड, आजकल लुप्त हो गए हैं। हमारे हर घर में घुंडी वाली खाट मिलती थी। जो आजकल एंटीक पीस के नाम से दस से पंद्रह हजार रुपए में बेची जाती है और हम हमारी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

अपने विचार। :

ढोला बचा सके तो बचाय ले,2 थारो नाम छपगो पोथ्या में। म्हारी मायड़ भाषा बच जाव। गौरी सब ने मेहनत करनी है, 2 म्हारी साख दांव पर लग री है। म्हारी मायड़ भाषा बच जाव।  : विद्याधर तेतरवाल, मोतीसर।

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