सीकर- 24 दिन की लाडली ने पिता की पगड़ी की रस्म का निभाया फर्ज, दृश्य देख हर कोई हुआ भाव विभोर

Sikar: दुनिया से अनजान एक नवजात जिसे अभी न तो परिवार, न समाज न देश और न ही दुनिया। किसी का कुछ अता-पता नहीं। लेकिन उसे अपने पिता की उस जिम्मेदारी का पालन करना पड़ा जिसे उसका जरा भी आभास नहीं था और न ही अभी है, होगा तो एक वक्त बाद- जब वह होश संभालेगी। लेकिन उस वक्त इस नवजात की दिल में एक टीस ही रहेगी कि उस बालअवस्था में जब उसे लाड की जरूरत थी, उसने उस दायित्व को निभाया जो अप्रत्याशित था।

चंचल महज 24 दिन की ही थी, और इस उम्र में ही उसके कोमल कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ आ गया। एक दुर्घटना में बच्ची के चाचा, चाची और पिता बंशीधर की मौ’त हो गई। मौ’त के 12 दिन बाद पकड़ी के रूप में बेटी चंचल के ही सिर पर पगड़ी पहनाई गई। जिसने भी इस दृश्य को देखा वो आंखे झलकाए बगैर नहीं रह सका। वहीं, दूसरी ओर बेबस और बिलखती मां के आंसुओं से मां की छाती और बेटी का सिर भीग रहे थे। इस दृश्य को देख कोई भाव विभोर हो रहा था तो कोई  कोई कुदरत की माया को कोस रहा था।

sikar pagdi

तारीख 12 मई को चौमू (Chomu ) के पास के गांव नांगल भरड़ा के रहने वाले चंचल के पिता बंशीधर कुमावत, भाई दीपेश और उसकी (Sikar) पत्नी पिंकी बाइक पर कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के लिए  झुंझुनू जिले के डंडूलोद गांव की ओर जा रहे थे। इसी दरमियां वे एनएच-52 (NH-52) पर मंढा मोड़ के नजदीक एक प्राइवेट डेयरी की दूध की गाड़ी जो जयपुर की ओर से आ रहा था। सड़क कट पर अचानक ट्रैक्टर के आने पर वह उसे बचाने के फेर में अनियंत्रित हो गया और वह बाइक पर जा गिरा। ऐसे में बाइक पर सवार तीनों लोगों की ट्रक के नीचे दब गए। हादसे की सूचना पाकर हाई-वे पेट्रोलिंग पुलिस के साथ-साथ खाटूश्यामजी और रानोली थाने की पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंची।

स्थानीय लोगों की मदद और क्रेन (Sikar) की सहायता से ट्रक को खड़ा करवा गया और तीनों के शव निकालने की कोशिश की। काफी प्रयास के बाद भी जब तीनों की नहीं निकाला जा सका तब जेसीबी मशीन को लाया गया और बड़ी जहमतों के बाद ट्रकों को हटाया गया। लेकिन उस वक्त तक तीनों की मौ’त हो चुकी थी। इस दुर्घटना के शिकार हुए दीपेश और बंशीधर के पिता अशोक कुमार और मां पतासी देवी को पीछे छोड़ गए, जिस वक्त बुजुर्गों को बेटों की जरूरी थी उस वक्त बेटे इस दुनिया को ही छोड़ कर चले गए और अब पीछे छूट गया है तो एक रोता-बिलखता बिखरा सा परिवार। अब परिवार में 24 दिन की मासूम चंचल के अलावा मां मोनू और दाद अशोक और दादी पतासी दीवी ही बचे हैं। मौ’त के 12 दिन बाद पगड़ी के वक्त जब मासूम चंचल को पगड़ी पहनाई गई तो इस दृश्य को देख हर कोई भाव विभोर हो गया।

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