मरुधरा क मगलूणा का अनगढ़ ही’रा ‘बीरमा’ सू स्वामी केशवानंद होवण री अनकही कहाणी

भारत रै मांयनै कई स्व’ तंत्रता सं’ ग्राम सेना’ नी, समाज सुधारक, महान संत, शिक्षाविद हुया उणा में स्वामी केशवानंद जी रो नांव बड़चावौ है।केशवानंद जी आपणै ई सूबे रा हा।शेखावाटी में मंगलूणा गांव,लछमणगढ़ तै’सील।इणी मंगलूणा में 1883 में ढाका परिवार में स्वामी केशवानंद जी रो जलम व्हियो।परिवार आर्थिक रूप सूं निबळौ हो।केशवानंद जी रै पिता रो नांव ठाकरसी अर माँ रो नांव सारा हो।बालपणै में घर गे मांयनै केशवानंद रो नांव बीरमा हो।जद बीरमा पांच साल रो हो जद उण रो परिवार मंगलूणा छोड़’न रतनगढ़ लद ग्यौ।

बीरमे रा पिताजी ठाकरसी रतनगढ़ में सेठां रे रतनगढ़ सूं लेयर दिल्ली तांई सामान ढोंता।बीरमा जद सात सालां रो हो जद उण रा पिताजी गुजर ग्या। परिवार में दूजौ कोई घर सांभणियो हो कोनी।जिम्मेदारी केशवानंद जी पर आयगी।मजूरी रे ख्याल सूं मां-बेटो दोनूं रतनगढ़ सूं पाछा उठ’न गंगानगर रै केलनिया गांव आय’ र बस गया।अकाल मरु रो बिरवौ है, कुआं में पाणी सूखगो।केशवानंद जी नैं हर जिग्यां दुख ई दुख देखणा पड़या।ऊपर ऊं राजा-रजवाडा़ रो दबदबो, अर आंरै ई ऊपर विदेसियाँ री धाक।अर आं सबां रे बीच 1899 में मां ई छोड़’न गयी।एक नौजवान बिल्कुल उदास होज्या जद एडी़ थितियाँ आवै।

पढ़ाई-लिखाई
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99 रै अकाळ केशवानंद नैं थार छुडाय दियौ।वे अब पंजाब नेडौ़ करयौ।बीरमा सूं केशवानंद अर केशवानंद सू स्वामी केशवानंद होवण री कहाणी अठे सूं सरू हुवै।पंजाब में वां रो संपरक उदासी सम्प्रदाय रा कुशलदास जी सूं होयौ।वां सांम्ही संस्कृत सीखण री जिगयासा केशवानंद जी राखी।कुशलदास जी कयौ संस्कृत तो म्हैं सिखा देऊं पण जाट जाति में ओ संभव कोनी। इं खातर तन संत बणणौ पड़सी।सन्यास धारण करणौ पड़सी।वां साधु आश्रम फाजिल्का सू शिक्षा लीन्ही अर उणानैं आश्रम में हिंदी, गुरुमुखी अर संस्कृत भाषाएं सीखाई गयी।1905 में प्रयाग कुंभ मेळै रे औसाण पर महात्मा ‘हीरानंदजी अवधूत’ बीरमा नैं स्वामी केशवानंद री उपाधि दी।

अब केशवानंद अनाथ, अणपढ अर यायावर हा।अर पछै सरु करया उआं आपरा महताऊ काम।300 ऊं ज्यादा स्कूल, पचासखण होस्टलां, अर कई लाइब्रेरियाँ रा संस्थापक केशवानंद जी रेया।1932 में केशवानंद जी नैं जाट स्कूल संगरिया रा निदेसक बणाया गया।जकै टेम वांनै निदेसक बणाया उण टेम उण संस्था री हालत भौत पोची ही।खनै कीं हो कोनी।केशवानंद जी घर घर जा’र अलख जगायी, पेसौ भेळौ करयौ अर उणरै उथान में लागगा।

अर उणरौ नांव जाट स्कूल सूं ग्रामोत्थान विद्यापीठ कर दियौ।साहित में जब्बरी रुचि लेवणिया केशवानंद एक महान सामाजि कार्यकर्ता ई हा।अबोहर में साहित्य सदन बणायौ उण सूं पैला ओ भवन अबोहर में नागरी प्रचारिणी सभा रे सरूप में सरू हुयौ।अबोहर में ई एक प्रेस जकी रो नांव दीपक हो, सरू किन्ही। 1941 में अबोहर में 30 वों अखिल भारतीय हिन्दी सम्मेलन करवाण में स्वामी जी रा ई प्रयास हा। 1942 में हिंदी सारु वांरी चाकरी नैं देखतां थकां वांनै “साहित्य वाचस्पति” री उपाधि दी गयी।लगातार दो बार 1952-58 अर 1958-64 में वे राज्य सभा रा सदस्य ई रया। भारत सरकार स्वामी जी रे नांव सूं डाक टिकट ई जारी करयौ। स्वामी जी रा परम शिष्य रैया खूबचंद बांठिया लिखे–

स्वामी केशवानन्द की यश गाथा, कोई क्यों कहेगा जुबानी। वह मगलूणा का बाल अकिंचन, था अनकही एक कहानी ।।
मरुधरा का वह अनगढ़ हीरा, नश्ल न जिसकी पहचानी। काल पृष्ठ पर छोड़ दी जिसने, अपनी अमिट निशानी।।
थी ललक बहुत पढ़ने की मन में, किन्तु रोटी बनी पहेली। बिना साधन शिक्षा मिल न सकी, रह गयी अबूझ पहेली।।
मनकी कुंठा से उपजी दृढ़ निश्चय की अजब कहानी।अबोध बालक घर छोड़ चला, बढ़ गया रहा अंजनी।।

वे स्वतं’ त्रता आंदो ल’न में ई अगरणी हा।1921 में वे गांधीजी रे के’णे पर अस’ हयोग-आंदो’ लन में शामिल हुय ग्या।भाषण जोशीलो देंवता।पुलिस बां पर अंग्रे’ जी सरकार विरोधी भा’वना वां भड़काण गो दोष दियौ अर दूजा आं’ दोलनकारियाँ रे साथै केशवानंद जी नैं ई झाल लिया।अर अंग्रेज मजि’ स्ट्रे’ट रे सांम्ही पेश करया गया।मजिस्ट्रेट माफी माँगण वाळा आं’ दोलनकारियों नै छोड़ रियौ हो। मजिस्ट्रेट स्वामी जी सूं पूछ्यौ के वे माफी माँग’र छूटणौ चावै? स्वामी जी रो सै’ ज उत्तर हो के जे म्हनै बिना माफी माँग मंगवा भी छोड़ दियौ जावै तो ई मैं पाछौ आंदो’ लन में ही सामल हु जास्यूं।इण करडे़ उत्तर पर वां दो सालां री जे’ ल री स’ जा ई भुगती। एकर वे आपरे दल सागे गिर’ फ्तार हुग्या अर मुलताण री सैण्ट्र’ ल जे’ ल में भेज दिया गया। बठै सू वे लगभग एक बरस पछै गांधी-इरविन पै’ क्ट होवण सू जेल ऊं मुगत हुया।अर इण क्रां’ ति’कारी जीवण नैं जीवता थकां वां 13 सितंबर 1972 में छेकड़ली सांस ली।

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