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राजस्थान

कैं’सर से जंग जीतकर 1000 बच्चों की जिंदगी सँवारने वाली ‘पुलिस वाली दीदी’ की संघर्ष की कहानी

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आज हम आपको एक ऐसी कहानी बताएंगे जिसे पढ़कर आप गर्व से कहेंगे कि वह राजस्थान की बेटी है। आप भी अपने बच्चों को उसकी तरह बनने की प्रेरणा देंगे। हम बात कर रहे हैं राजस्थान की रहने वाली सुनीता चौधरी की। सुनीता चौधरी ने अपनी कहानी कुछ यूं बयां की उसे पढ़कर आप भी सुनीता पर गर्व करेंगे। सुनीता बताती हैं कि जब वह 3 साल की थी तो उनकी शादी कर दी गई, उनके समुदाय में बाल विवाह करना एक सामान्य बात थी।

लेकिन उस दौरान ये तय हो जाता था कि जब 18 की होंगी तब वह अपने ससुराल जाएंगी। 3 साल की उम्र में शादी होने के बाद उन्होंने इस सब की चिंता छोड़ दी। सुनीता ने बताया कि जब वह 5 साल की थी तो उन्हें अपने गांव के स्कूल में भेज दिया। उन्होंने अपने पापा से कहा कि *पापा मुझे ऑफिसर बनना है मुझे स्कूल भेज दो*। उनके पापा ने उन्हें स्कूल भेज दिया। गांव में बिजली ना होने के कारण सुनीता लालटेन से पढ़ती थी। स्कूल से आ जाने के बाद वह खेतों में जाकर काम करती और रात को आकर के लालटेन में पढ़ती। सुनीता बताती है कि वह हमेशा फर्स्ट आया करती थी।

कक्षा 5 तक पढ़ने के बाद वह 6 किलोमीटर रोजाना चलकर की स्कूल जाती थी। सुनीता बताती हैं कि उनके पड़ोसी उन्हें चिढ़ाया करते थे और कहते थे कि *इतना पढ़ कर क्या करोगी आखिर में तो ससुराल ही जाना है*। लेकिन सुनीता ने उन सभी बातों को अनसुना कर दिया और पढ़ना शुरू कर दिया। दसवीं कक्षा तक पढ़ने के बाद वह शहर में पढ़ने चली गई और वहां जाकर उन्हें पता लगा कि पुलिस कांस्टेबल की नौकरी निकली है। जिसके लिए फार्म भर दिया, सुनीता बताती हैं कि उस परीक्षा को पास करने वाली व केवल एक मात्र लड़की थी।

जब परीक्षा पास की तो उन्होंने अपने पिताजी को बताया और पिताजी ने कहा कि तेरे ऑफिसर बनने का सपना पूरा ही होना चाहिए। सुनीता 9 महीने की ट्रेनिंग के लिए चली गई और जब 9 महीने की ट्रेनिंग के बाद गांव लौटी तो वहां गांव की वह पहली पुलिस भर्ती कांस्टेबल थी। वे बताती हैं कि तब उनकी उम्र केवल 19 वर्ष की थी। जब गांव लौटी तो जिन गांव वालों ने उन्हें पढ़ने पर टोका था, वही गांव वाले उन्हें खड़े होकर सलूट कर रहे थे और बोल रहे थे पुलिस साहिबा आ रही है।

जीवन में आया बदलाव

सुनीता के बताती हैं कि सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन एक दिन अचानक उनके पेट में दर्द होने लगा डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टर ने कहा कि उन्हें कैं’सर है। डॉक्टर्स का कहना था कि कैं’सर दूसरी स्टेज तक पहुंच चुका है। जिसके बाद सुनीता ने बताया कि 6 महीनों के भीतर की कीमोथेरेपी के तहत उनके सारे बाल उड़ गए और उनका वजन भी केवल 35 किलो रह गया। उनके पिता ने उनके इलाज पर 4 लाख रुपये खर्च किए। इसके बाद लोगों ने बोला कि बेटी पर इतना पैसा क्यों खर्च कर रहे हो, यहां तक कि लोग उन्हें गंजी बुलाने लगे। सुनीता बताती हैं कि वह केवल चार दीवारों में कैद नही होना चाहती थी। सुनीता ने इसके बाद अपना काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने सिर को ढकने के लिए टोपी पहनना शुरू कर दिया। सुनीता ने मन को बहलाने के लिए हारमोनियम सीखना शुरू कर दिया।

पति का मिला पूरा साथ

इसके बाद सुनीता ने कहा कि उसके पति और उसने साथ रहना शुरू कर दिया। जिसके बाद उन्होंने अपने पति को बताया कि उन्हें ओवेरियन कैं’सर है, इस कैं’सर में मां बनने की चांस भी बहुत कम होते हैं। लेकिन उनके पति ने उन्हें हंसकर यह जवाब दिया कि उन्हें इससे कोई मतलब नहीं वह बस सुनीता के साथ रहना चाहते हैं। इतना ही काफी है। सुनीता के बताती हैं यह सुनकर वह कैं’सर की आधी जंग जीत चुकी थी।

बच्चो की बनी पुलिसवाली दीदी

इसके बाद उन्होंने सामाजिक कार्य शुरू करने कर दिया। वह वह ड्यूटी करने के बाद बच्चों को पढ़ाती बच्चों को ट्रैफिक सुरक्षा और गुड बैड टच के बारे में बताती। बच्चों ने सुनीता को पुलिस वाली दीदी बुलाना शुरू कर दिया। सुनीता बताती हैं कि पिछले 3 वर्ष में उन्होंने 1 हजार से ज्यादा बच्चों को पढ़ाया है। इसके लिए राजस्थान के पुलिस कमिश्नर ने उन्हें सम्मानित भी किया है।

पिछले दिनों को करती है याद

वह बताती हैं कि वह अपनी बीमारी के दौरान 25 एल्बम को इकट्ठा किया था। वह अपने पिछले दिनों को याद करती हैं कभी सिर पर बाल भी नहीं थे और आज उनके बाल आ गए है। वह अपनी पुरानी फोटो को आज भी देखती हैं और याद करती है कि वक्त कितना बदल गया है और वह कहां से कहां तक आ गई। जहां लोग उन्हें गंजी बोलते थे आज लोग उन्हें पुलिस वाली दीदी के नाम से पुकारते हैं।

कहानी बताने के पीछे हमारा मकसद केवल यही है कि जहां लोग बीमारी से ग्रस्त होने के बाद गलत कदम उठाने को दौड़ते हैं। वही सुनीता ने हिम्मत और साहस से अपने बीमारी से लड़ना और जीतना तय किया। जब बचपन में उनकी शादी कर दी गई और उसके बाद उन्होंने पढ़ना शुरू किया और सरकारी नौकरी भी हासिल की। सुनीता की कहानी वाकई प्रेरणा देने वाली है हम सब को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। किस तरीके से सुनीता ने अपने परिवार वालों की मदद से जीवन में आगे बढ़ कर के खुद के जीवन और साथ ही एक हजार से ज्यादा बच्चों के जीवन को सुधारा है। वह आज भी इस नेक काम को कर रही हैं। सुनीता की इस नेक काम की पहल को हम सच्चे दिल से सलाम करते है।

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