क्या है ‘प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट’ जिससे ज्ञानवापी मस्जिद-मंदिर विवाद सुलझ सकता है!

Gyanvapi Masjid Mandir Dispute Explain: जानिए उपासना स्थल (विशेष) अधिनियम – 1991 जिससे जुड़े हैं काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद के तार?

यह दौर 90 का था। इस वक्त देश के भीतर वैश्वीकरण (Globalization) की शुरुआत हो चुकी थी, जहां देश प्रगति के पथ पर अग्रसर था. वहीं धार्मिक विवाद भी तेजी पकड़ रहे थे। 90 के दशक की शुरुआत में ही राम जन्मभूमि (Ram Janambhumi Dispute) आंदोलन प्रखर रूप से सामने आया. सन् 1991 के लोकसभा चुनाव के दौरान लिट्टे (LTTE) के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी (Former PM Rajeev Gandhi) की ह’त्या कर दी गई और नरसिम्हा राव (NarSimha Rao) जून, 1991 में प्रधानमंत्री पद के पद पर नियुक्त हुए। यह वो समय था, जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था. अयोध्या में बाबरी मस्जिद (Babro Masjid) के साथ ही उन तमाम मस्जिदों को परिवर्तित करने की मांग उठने लगी, जहां पूर्व में कथित तौर पर मंदिर रहे थे, या मंदिर होने का दावा और विवाद था. ऐसे समय में राव की सरकार ने सांप्रदायिक उन्माद को शांत करने के लिए एक कानून बनाना आवश्यक समझा और वह कानून था, प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप (Places of Worship Act) एक्ट यानी उपासना स्थल अधिनियम.

नोट: कृप्या ठीक प्रकार से समझने हेतु पहले यह पढ़ें ज्ञानवापी मस्जिद का वह अनछिपा इतिहास, जिससे शायद आप अनजान हैं! यदि पढ़ चुके हैं तो जारी रखें…

तत्कालीन गृह मंत्री, शंकरराव चव्हाण (Shan kar Rao Chouhan) ने दिनांक 10 सितंबर, 1991 में लोकसभा में बहस के दौरान इस बिल को भारत के प्रेम, शांति और आपसी सौहार्द के महान संस्कारों का एक सूचक बताया और कहा कि ‘सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता हमारी महान सभ्यता का चरित्र है. यह एक्ट दिनांक 15 अगस्त, 1947 तक अस्तित्व में आए हुए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी स्मारक के धार्मिक आधार पर रखरखाव पर रोक लगाता है.

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यह एक्ट मान्यता प्राप्त प्राचीन स्मारकों पर लागू नहीं होगा. यह अधिनियम अयोध्या में स्थित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद और उक्त स्थान या पूजा स्थल से संबंधित किसी भी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही के लिए लागू नहीं होता है. यानी इस अधिनियम या कानून को अयोध्या विवाद से अलग रखा गया, क्योंकि यह माना गया कि इसका विवाद 1947 से पहले से चल रहा है. इस अधिनियम ने स्पष्ट रूप से अयोध्या विवाद से संबंधित घटनाओं को वापस करने की अक्षमता को स्वीकार किया. यह कानून जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) को छोड़कर पूरे भारत के लिए था.

यही कारण है कि तमाम हिंदू संगठन इस क़ानून में संशोधन की मांग उठाते रहे हैं. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दाखिल की गई है जिसका नतीजा आना अभी बाकी है. कानूनी नज़रिए से देखें तो इस अधिनियम के लागू होते ही सभी धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गए. मस्जिद पक्षकार अंजुमन इंतजामिया मस्जिद के प्रवक्ता एसएम यासीन कहते हैं कि यह क़ानून देश की संसद ने बनाया है और सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस पर मुहर लगाई है. अयोध्या मामले पर फैसला सुनाते हुए भी संवैधानिक पीठ ने यह बात दोहराई है कि देश के तमाम अन्य धर्मस्थलों पर 1991 का एक्ट लागू होता है और इससे छेड़छाड़ नहीं हो सकती. इस ऐक्ट को बदलना संविधान के खिलाफ है और जब तक यह एक्ट है, हमारा दावा सबसे मज़बूत है. Gyanvapi Masjid Mandir Dispute Explain

दूसरी तरफ़ हिंदू पक्ष के वकील विजय शंकर रस्तोगी बताते हैं कि यदि 1991 के क़ानून को न भी बदला जाए तब भी हिंदुओं का पक्ष कमजोर नहीं है. हम 1991 के क़ानून को अगर मान भी लें तो यह तो तय करना ही होगा कि 15 अगस्त 1947 के दिन उस जगह पर मंदिर थी या मस्जिद थी. हमारा कहना है कि उस जगह पर हमेशा से मंदिर ही रहा है और इसकी जांच के लिए पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) करवा लिया जाए. इसी से सच्चाई का पता लगाया जा सकता है।

आगे जारी रखें…

काशी विश्वनाथ मंदिर, अहिल्याबाई होलकर और विवादस्पद कानूनी लड़ाई…

 

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