काशी विश्वनाथ मंदिर, अहिल्याबाई होलकर और विवादस्पद कानूनी लड़ाई…

Kashi Viswanath Mandir Full Story: आइये अब जानते हैं, इस मामले कि कानूनी लड़ाई

काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Mandir) का इतिहास अयोध्या की तरह विवादित नहीं है. यहां कई बातें साफ हैं जिन्हें सभी पक्ष सहज स्वीकार करते हैं. जैसे यह तथ्य विवादित नहीं है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था और यह निर्माण मंदिर तोड़कर किया गया था. औरंगजेब से पहले भी काशी विश्वनाथ मंदिर कई बार टूटा और कई बार बनाया गया, लेकिन सन् 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़कर वहां ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid) बनवा दी. मंदिर को फिर से बनाने के कई असफल प्रयासों के बाद आखिरकार सन् 1780 में अहिल्याबाई होलकर (Ahaliyabai Holkar) ने मस्जिद के पास एक मंदिर का निर्माण करवाया और यही आज काशी विश्वनाथ मंदिर कहलाता है.

नोट: कृप्या ठीक प्रकार से समझने हेतु पहले यह पढ़ें (पहला फेज़) ‘ज्ञानवापी मस्जिद का वह अनछिपा इतिहास, जिससे शायद आप अनजान हैं!’ यदि पढ़ चुके हैं तो जारी रखें…

ये इतिहास का वह पहलू है जो निर्विवाद है. इससे अलग जो विवादित पहलू हैं उन्हें समझने की कोशिश न्यायालय में चल रहे मुकदमे से करते हैं. यह मुक़दमा है- वाद संख्या 610 सन 1991. यह एक रिप्रेसेन्टेटिव सूट यानी प्रतिनिधित्व वाद है और इसका नाम है ‘प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर व अन्य बनाम अंजुमन इंतजामिया मसाजिद व अन्य.

साल 1991 में यह मुक़दमा काशी के तीन लोगों ने दाखिल किया था. इनमें पहले थे पंडित सोमनाथ व्यास, दूसरे थे पंडित रामरंग शर्मा और तीसरे थे हरिहर पांडेय. इन तीनों के अलावा इस मुक़दमे के चौथे वादी थे ‘स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर.’ इस पक्ष की पैरवी बीते कई सालों से अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी कर रहे हैं. दूसरी तरफ़ अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव और प्रवक्ता एसएम यासीन हैं.

हालांकि 1991 के मूल वाद में हिंदू पक्ष की मांग है कि विवादित क्षेत्र स्वयंभू विश्वेश्वर का ही अंश है परिणावस्वरूप वह इलाका हिंदुओं को सौंप दिया जाए, लेकिन फ़िलहाल यह पूरा मामला विजय शंकर रस्तोगी द्वारा उठाई गई पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग पर आकर सिमट गया है. रस्तोगी इस विवाद से जुड़े एक और पहलू को उठाते हुए बताते हैं कि ‘मुस्लिम पक्ष ने बाकायदा लिखित में न्यायालय से कहा है कि विवादित मस्जिद ‘अहल ए सुन्नत’ से वहां क़ायम है अर्थात वह खुद दावा कर रहे हैं कि जब से क़ुरान नाजिर हुई है, तब से उस स्थान पर मस्जिद है. यह दावा ऐतिहासिक प्रमाणों के विपरीत है, लिहाज़ा मुस्लिम पक्ष अपने ही दावों में फंस गया है.

विजय शंकर रस्तोगी की इस बात को सिरे से नकारते हुए एसएम यासीन कहते हैं कि कोई नासमझ भी यह बात कैसे कह सकता है कि पैगम्बर मोहम्मद (Prophet Muhammad) के समय से ज्ञानवापी मस्जिद मौजूद रही है. रस्तोगी जी अपनी समझ के अनुसार इसकी व्याख्या कर रहे हैं. मुस्लिम पक्ष ने अगर कहीं ‘अहल ए सुन्नत’ जैसी बात का जिक्र किया भी है तो उसका मतलब ये है कि यह सुन्नी समुदाय के लोगों की मस्जिद है.

यह जरूर पढ़ें- (कहानी का सेकंड फेज़)- क्या है ‘प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट’ जिससे ज्ञानवापी मस्जिद-मंदिर विवाद सुलझ सकता है!

जब देश आजाद हुआ यानी दिनांक 15 अगस्त 1947 के दिन तब विवादित स्थल पर मंदिर था या मस्जिद थी ? यह सवाल उठाकर विजय शंकर रस्तोगी ने इस पूरे मामले में एक नई बहस छेड़ दी है, जिसपर दोनों ही पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं. अधिवक्ता रस्तोगी कहते हैं कि विवादित स्थल पर गुंबद के नीचे आज भी शिवलिंग विराजमान है, जिससे साफ है कि वह मस्जिद नहीं बल्कि मंदिर है. इसके अलावा बेसमेंट के हिस्से पर आज भी मुस्लिम पक्ष का नहीं बल्कि हिंदू पक्ष का ही क़ब्ज़ा है. तो यह कैसे कह सकते हैं कि वो एक मस्जिद है ? Kashi Viswanath Mandir Full Story

इसके जवाब में एसएम यासीन कहते हैं कि दिनांक 15 अगस्त के दिन वहां मस्जिद थी और एक नहीं बल्कि कई तरीकों से स्थापित होता है. पहला तो यही कि जब हिंदू पक्ष ख़ुद ही कहता है कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बना दी थी तो फिर अब वो किस आधार पर कह रहा है कि वहां मस्जिद नहीं है. दूसरा, सन् 1936 में दीन मोहम्मद व अन्य बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया’ नाम से एक मामले में फैसला आया था, जिसके अनुसार उस दौर में मस्जिद के पिछले हिस्से में जनाजे के नमाज़ पढ़ी जाती थी. इस फैसले में साफ कहा गया है कि वह जगह मुस्लिम वक्फ की सम्पत्ति है. सन् 1942 में हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को सही माना है. ये दोनों फैसले इस बात के सबूत हैं कि 1947 के दौरान वो जगह घोषित तौर से मुस्लिम वक्फ की संपत्ति थी.

विचारणीय है कि अयोध्या में राम मंदिर पर आए फैसले के बाद अब द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक को लेकर खुदाई की मांग उठने लगी है. इसी कड़ी में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) कराने की अपील हाल ही में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से सिविल जज (सीनियर डिवीजन-फास्ट ट्रैक कोर्ट) की अदालत में प्रार्थना पत्र देकर की गई थी.

मस्जिद पक्ष का कहना था कि मंदिर -मस्जिद का विवाद सिविल कोर्ट द्वारा तय नहीं किया जा सकता क्योंकि यह कानून द्वारा बाधित है क्योंकि इस मामले पर 1998 से इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्थगन आदेश पारित है. Kashi Viswanath Mandir Full Story

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