क्या है विंध्याचल माता विंध्यवासिनी का इतिहास, श्रीकृष्ण भगवान से जुड़ा है गहरा नाता!

प्रयागराज: तपोभूमि माने जाने वाला विन्ध्य क्षेत्र ऋषि-मनीषियों के अलावा तपस्वियों और भक्तों की भूमि भी रही है। विन्ध्य क्षेत्र कई आध्यात्मिक स्थानों का केन्द्र माना जाता है। यह मंदिर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मिर्जापुर (Mirzapur) से लगभग 8 किमी की दूरी पर माँ गंगा की निर्मल धाराओं के समीप स्थित है। विंध्यवासिनी का मंदिर (Maa Vindhyavasini Temple) 51 शक्तिपीठों में शामिल एक जाग्रत पीठ माना जाता है। इस मंदिर की ऐसी कई मान्यताएँ हैं जो अपने आप में अनूठी हैं। इसका इतिहास उतना ही पुराना है जितनी यह संपूर्ण सृष्टि। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी तब उन्होंने इसके संचालन और संवृद्धि के लिए मनु और शतरूपा को बनाया था। विवाह के बाद मनु ने अपने हाथों से माँ भगवती की मूर्ति बनाई और उनकी कड़ी तपस्या की। मनु की तपस्या से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं और मनु को खूब वरदान दिए। इसके बाद माता विन्ध्यांचल रहने चली गईं।

श्रीकृष्ण की बहन है माता विंध्यवासिनी!

Maa Vindhyavasini Temple

कुछ मान्यताओं के अनुसार माता विंध्यवासिनी कोई और नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बहन योगमाया (Yogmaya) हैं जिसे कंस ने वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान समझकर मारना चाहा था, लेकिन वह नवजात कन्या कंस के हाथ से नकलकर आकाश पहुँच गई और कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी की और उसके बाद उन्होंने यहीं विन्ध्याचल में रहना स्वीकार किया। मार्कंडेय पुराण, पद्म पुराण एवं श्रीमद्भागवत महापुराण में मिर्जापुर की माता विंध्यवासिनी का वर्णन है और कहा गया है कि माता प्रलय के बाद भी इस सृष्टि में निवास करेंगी।

त्रिकोण यात्रा या परिक्रमा

विन्ध्यांचल क्षेत्र में माता विंध्यवासिनी के मंदिर के अलावा दो और मंदिर हैं। जिसमें से एक मंदिर काली खोह पहाड़ी स्थित महाकाली का है और दूसरा मंदिर एक अन्य पहाड़ी पर स्थित माता अष्टभुजी का है। कहा जाता है विन्ध्यांचल क्षेत्र में इस त्रिकोण यात्रा का बड़ा महत्व है और जब तक बाकी दो मंदिरों की यात्रा नहीं की जाती तब तक माता विंध्यवासिनी के दर्शन अधूरे ही माने जाते हैं।

नवरात्रि के दिनों में चार बार होता है माता का श्रृंगार

बता दें कि इस मंदिर के कपाट रात 12 बजे से सुबह 4 बजे तक बंद होते हैं, लेकिन नवरात्रि (Maa Vindhyavasini Temple) के दिनों में चार बार माता का श्रृंगार करने के लिए पट बंद किए जाते हैं। नवरात्रि में महानिशा पूजा का अलग ही महत्व होता है। इसके अलावा अष्टमी पर भी मंदिर में वाममार्गी और तांत्रिकों का जमावड़ा लगा रहता है।

कैसे पहुँचे माता विंध्यवासिनी के मंदिर?

मिर्जापुर सड़क मार्ग वाराणसी और प्रयागराज से जुड़ा हुआ है। दोनों शहरों में हवाईअड्डे भी हैं। सबसे नजदीक वाराणसी का हवाईअड्डा है जो मंदिर से लगभग 72 किमी की दूरी पर है। विन्ध्याचल रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 1 किमी है। वहीं, मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित होने के कारण मध्य प्रदेश के शहरों से भी आप यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।

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