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साहित्य

जुवि शर्मा की कविताएँ

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जुवि शर्मा की कविताएँ

1. दुहागण
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सूखे बालों से लेकर
बीसों नाखून के सुण सास्त्र देखती
आदमी को उडीकती जब हार जाती ,
सारे हिसाब लगाती
कोई पित्तर , देव , ज्योत ,
तिथि ,मावस कुछ टाल तो नहीं दी ?

सारे बरत बडुले आदमी के लिए थे पर
जब हाथ नहीं लगाने देती तो कहता ,
मुझसे बड़ी हैं के तेरी आठे माता ?
आदमी से बड़ा कोई बार त्यौहार नहीं था
ये सिंदूर का अखंड सच सब जानती हैं

मलाई सी उंगलियां जो बिवाई रगड़ने वाले
पत्थर सी खुरदरी हो चुकी है ,
आंखों के नीचे घेरे सूखे जोड़े बनते जा रहे है
बेबात पर रीस आने पर घर वाले सुन्नी बताते है

हर गलती की अलग भाववाचक संज्ञा है
कुछ रळ गया है , कोई चक्कर
डोरा , ताबीज़ जब काम नहीं आए तो
कुलछनी सुनना स्त्रियों के लिए सब गालियों का सार है

पेट मैं भरता हूँ और नमकहराम
पंचायत दूसरे खसम से करती है
कपड़ा , लत्ता , गहना गाति सब कहां से लाई ?
तेरे उपास के चलते नहीं जी रहें हम

ऐसी सुहागिनों का क्या किया जाए ?
मन का सुख हेरती लुगाईयों को कोई देव आडे नहीं आते
अब समाज इनको दुहागण कहेगा या सुहागण ?

2. प्रेमिकाओं के हिसाब
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सुंदर और बदसूरत औरतों के
बंटवारे में इनकी तूती बोलती है ।
वो सिग्नल की लाल हरी लाइटों से
छनकर आती रोशनी में भी
किसी भी स्त्री का सटीक संस्कार ,
धर्म , जाति , व्यवहार बता सकता है ।

वो सुन सकता है
भद्दे चुटकुले
शुका की माफ़िक मोटी जिह्वा ने
रट रखी है माँ बहन की गालियाँ

अपने जीवन के प्रत्येक पड़ाव का मूल्यांकन
केवल एक ही सूत्र पर स्थापित किया है
बाजारवाद
उपभोक्तावाद
वो सारे वाद जिसके आर्थिक मूल्य नापें जा सके

मानसिक तौर पर विकलांग हैं
उसे रुदन करती स्त्रियां देख हँसी आती है
उसे लगता है
स्त्रियां रोकर धरती अवसादी बना रही है
अपनी कई प्रेमिकाओं के हिसाब उसे कंठस्थ है

उम्र की ढलान पर
अब लाचार है
बूढ़ा बदबूदार शरीर
उंगलियां हिलाता
रोना चाहता है
स्वयं की उखड़े तंबू
स्थिर कर रहा
लिख रहा है
आर्थिक सुधारीकरण हेतु
प्रायोगिक कविताएं….

3.माँएं आत्महत्या क्यों नहीं करती
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मेरे जन्म का शोक माँ ने
इक्कीस दिन प्रसूतागृह में भोगा था
अपनी जन्मजात कन्या को रोते हुए गोद में लेना
उनकी पहली असफल आत्महत्या थी ।

कंजक जिनका स्वागत नहीं किया जाता
वहां कवच , अर्गलास्त्रोत्र , क्षमा प्रार्थना ,देवी सूक्तम किस तरह मान्य होंगे ?

स्त्रियाँ हत्यारिन
अपना गर्भपात करवा कर बनी
मेरे देह की अंदरूनी हलचल
मुझे इंगित करवा रही थी
संसार के लिंगानुपात का ढांचा
एक बार फिर डगमगाने वाला है ।

स्त्रीलिंग शावक के प्रादुर्भाव पर पशु शोक नहीं मनाते
वहाँ कन्या भ्रूण को पपीते और लौंग खिलाकर
गिराया नहीं जाता

चिरैया , गौरैया पर मूल मंगल नहीं लगते
उनके भ्रूण का लिंग जांच नहीं होता
दाईयां उन्हें बदलती नहीं
अस्तु ! आत्महताएं भी नहीं होती
भगवान मरीचिमाली की ताम्रवर्णी शाश्वत्व रश्मि को जन्म देकर मैं समझ पाई
माँएं आत्महत्या क्यों नहीं करती।

4.कई मर्दों से प्रेम करनेवाली
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कई मर्दों से
प्रेम करने वाली स्त्री
पूरे गाँव के चूल्हे की आग होती है

उनका प्रेम याचना नहीं होता
इस सिस्टम को
दैहिक दैविक भौतिक ताप
वाली चौपाई से समझा जा सकता है

एक आवेदन जो
कोई भी स्वीकार करें
नीचे लिखे हुए बारीक अक्षरों में
नियम और शर्तों अनुसार

जो प्राय पढ़ने के लिए नहीं होती
बार्टर के नियम हम पौराणिक काल से जानते है
इस देनदारी में गर स्त्री रांड हुई
तो पुरुष वही मरखन्ना बैल हुआ
जो गाँव के बाहर पड़े कूड़ेदान में
गिरी झूठी पत्तल चबाता है
कोई फुंटूश नहीं ….

दीवारों पर लगने वाला फंगस
जिनकी जाति देह के लिए जीती है
गंधर्वों के उपासकों का
कोई वर्गीकरण
कोई नियमावली
अवैधानिक है।

5.शोक सभा
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पहली बार मरने की जब सोची थी सारूप्य
पहली बार लिखने की भी सोची होगी
दोनों ही विकल्प समदर्शी थे
जीने के लिए लिखना श्रेयस्कर था

जीवन का एकमात्र मूलमंत्र
अलभ्यता सर्वश्रेष्ठ मानी गई
और कमतर दुत्कार दिया गया
इस भेड़चाल की शुरुआत किसने की ?

चीटियों के मरने पर शोक नहीं हुआ करते
गधे बोझ ढोते ढोते कब दफना दिए गए किसी ने नहीं देखा
सिंधु घाटी सभ्यता में चींटियों की प्रार्थना सभाएं
गधों के मृत्यु भोज की कहीं व्याख्या नहीं
किंतु मुझे मृत्यु भोज और प्रार्थनाएं दोनों ही चाहिए
क्योंकि कविताएं ही वो चकमक पत्थर थी
जिसनें गीली लकड़ियों को बुझने नहीं दिया
जिनकी कोई वृति नहीं थी
शोक सभा में उनकी कविताएं पढ़ी जाएंगी।

6.द ब्लडी कर्स
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द ब्लडी कर्स
अंधेर घुप्प कमरे में
आवाज़ें तैरती है
इनका कोई अर्थ नहीं

काली कथाओं की
उज्ज्वल उदासियां
जिनकी दैविक संवेदनाओं के पास
कोई भाषा नहीं
वो रो सकती है
या लिख सकती है

मेरी कविताओं ने सारे आंसू चुरा कर
किसी निशाचर को
सस्ते दामों पर बेच दिए
रोना भूलकर कोई कब तक जिंदा रह पाएगा

घृणित कलुषित कविताओं का पोथा
जिनका कोई मैटर नहीं
अब मोटी दुखद डायरी बनती जा रही है
आस्थाओं का अडिग आधारस्तंभ
जो हमेशा दुख की हथेली पर पनपा
और फलता फूलता गया

इस श्वेत आत्मा को
विखंडित कर
खंडों में प्रेषित नहीं किया जा सकता
किताबें बिकने के लिए लिखी गई
लेकिन आत्मओं के विदीर्ण स्वर कौन पढ़ेगा ?
घातक सपनों की सबसे उदास कविताएं….

7.किताब के पन्ने और मौन
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कमरे के चारों तरफ
छोटे – छोटे नोट्स बनाकर
चिपकाएं हुए है

सब कुछ भूलते चले जाना
कभी वरदान लगने लगता है
दिक्कत तब होती है
जब दिमाग की रब्बर खराब हो जाए
जिसे भूलना था
उसे याद से लिख – लिखकर भूलने की कोशिश कर रही हूँ

वही मन अपनी अंतिम परिधि पर
एकांत की प्रबल चाह में
इच्छाओं को घोंघा समझ
स्मृतियों की बौछारों को रोकने
रूई की फाहों से
शब्दों को पोछते जा रहा है

किताबों के पन्ने
और मेरा मौन
दोनों की आवाजें
विस्फ़ोटक बनने लगी हैं

कविताओं का घुमड़ता कोलाहल
बैंडेज का काम करता है
इसका हीलिंग पावर
मेरी मृत कोशिकाओं को जीवित रखें हुए है।

8.पाखंड
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पीड़ा में रुदन
रुदन का कोलाहल
कोलाहल का पलायन
पलायन से प्रेम
प्रेम की कल्पना
कल्पना जीवन को जीवंत करने की
केवल गल्प मात्र हैं

सत्य
सत्य हमारी सूक्ष्म चेतना
नितांत एकाकी
कुसुमित
उस अकूत क्षोभ पर मुस्कुरा रही है

माटी की दो देह के विलग होने का शोक
बालू से बने नीड़ के बह जाने का शोक
शोक व्यवस्था की अस्थायी अव्यवस्था पर
अस्थिर जीवन की स्थिर प्रेम की पीड़ाएं
अल्पस्वप्न की भांति
केवल पाखंड पर रो रही हैं।

परिचय :

जुवि शर्मा हिन्दी की नई पीढ़ी की कवि है।नई शैली की कवि।उनकी कविताओं में स्त्री एक अलग ढंग से आती है।उनकी रचनायें अक़्सर पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।

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