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साहित्य

संदीप निर्भय की कविताएँ

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1.मुसलमानों की गली
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वह शहर की उस गली में गया
जहाँ से कतराते हैं अक्सर लोग

पान की गुमटी में बैठी एक बुढ़िया
पढ़ रही है उर्दू की कोई किताब
उसके मुँह से निकलने वाले हरफ़
दौड़े जा रहे हैं इबादत के घोड़े पर सवार होकर

मस्जिद के पास एक चबूतरा है
वहाँ बतिया रहे हैं बुज़ुर्ग लोग
चुग रहे हैं पखेरू दाना
जैसे सभी मज़हब के ख़ुदा हुक्का पीते हुए
धरती, गेहूँ और बाजरे के दानों से बतिया रहे हों

बग़ीचे की ओर तनी तोप की नाल में
चूजों ने खोली हैं चोंच
छेड़े हैं तोप के विरुद्ध गीत

रहीम चाचा गाय दुहते वक़्त कह रहे
कि दसेक दिन की बछड़ी
मर गई थी कल रात
फिर भी बेचारी
लात नहीं मारती, दो बखत धार देती है
अनबोल जीव किससे कहे अपना दु:ख

औरतें बना रही हैं लाख की चूड़ियाँ
कछेक रंग रही हैं ओढ़ने
कर रही हैं कढ़ाई कुछेक
गोबर थापती
सुना रही हैं उपलों को जीवन की वर्णमाला

जब माँएं बच्चों की हथेलियों-पगथलियों पर
बना रही होती हैं काजल का चाँद
तब दरगाहों से खड़े होकर
पीर-फकीर धूल झाड़ते हुए
आकर बैठ जाते हैं
बच्चों की हथेलियों पर मारकर पालथी
उस वक़्त ऐसा लगता है
कि बच्चों की हथेलियों में रचा-बसा हो समूचा गाँव

सुनों,
अभी-अभी मुसलमानों की गली में
छेड़ी है किसी भोप्पे नें रावणहत्थे पर
‘तालरिया मगरिया’ की धुन !

2.गाँव में मनिहारिन का आना
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बेमौसम की तरह सिर पर गठरी लिए
चली आती है गाँव में मनिहारिन
जैसे बेमौसम आती है आँधियां
जैसे बेमौसम होती है बारिश
जैसे बेमौसम शरमा जाती है औरतें

गाँव की गली-गली, घर-घर के आगे
घुम रही होती है जब मनिहारिन
यह कहती हुई–
‘चुड़ी, मिणियाँ, मेहंदी ले लो
ले लो कांच-कांगसी बाई सा!’
तब लड़कियाँ दौड़कर जाती हैं उस वक़्त
घर की बाड़, दीवार, खिड़की की ओर,
औरतें खड़ी होकर चौक पर
घर के भीतर आने का करती हैं उसे हाथों से इशारा

बेरोजगारी में भाड़ा और आशा से भर आयी
मनिहारिन घर में आकर
गठरी उतारती हुई
बैठ जाती है चौक पर

बास की औरतें व लड़कियाँ
दौड़ी आती है मनिहारिन के पास
चारों ओर एक घेरा डालकर
देखती है ध्यान से एक-एक चीज़

लड़कियाँ खरीदती हैं
रबड़, बिंदिया और मेहंदी
बहुएँ ख़रीदती हैं
अंतर्वस्त्र, कांच-कांगसी, क्रीम
और सबसे बुज़ुर्ग महिलाएँ
पोतों-पोतियों के लिए
काजल की डिबिया ख़रीदती हुई हो जाती हैं हरी

आख़िरकार वस्तुओं का होता है मूल्य
मूल्य को लेकर खींचातानी
मुट्ठियों में भींचे पैसे निकाल कर
सब की सब कर देती हैं
हँसती हुई मनिहारिन का हिसाब-किताब

ओढ़ना सिर पर लेती हुई मनिहारिन
बातों-बातों में जचाती है
गठरी में सलीक़े से वस्तुएँ
और देती है गाँठें
जैसे रंगीन मौसम को गाँठों के साथ सिमटा जा रहा हो
और गठरी सिर पर रख दूसरी गली की ओर चल देती है

ज़रा सोचो जिस गाँव में मनिहारिन नही आती
उस गाँव की खेजड़ियों के पत्तों पर
कहाँ ठहरती है क्षणभर के लिए ओस की बूँदें !

3.धरती के गीत
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जीवन के हवन में जब दे रहा होता हूँ
पसीने की बूँदों की आहुति
उस वक़्त मैं–

मंत्रोच्चारण नहीं करता
न ही स्मरण करता हूँ
इष्ट देवता का
और न ही लेता हूँ प्रेमिका का नाम

बल्कि जूती में से रेत झाड़ता
बीड़ी पीता हुआ
गा रहा होता हूँ
हल की नोक पर ठहरी धरती के गीत!

4. कवि
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जब बच्चों की उँगलियाँ
थामती हैं खड़िया
तब देश की स्लेट पट्टी पे उग आती है घास

बच्चे कुर्ते की जेब से जब
चुराते हैं सिक्के
तब कमेड़ी की तरह उड़ता है माँ का मन

बच्चों की हथेलियाँ से
छूती हैं मिट्टी
तब आकार लेना चाहते हैं घरौंदे

बच्चे गाँव की गलियों में जब
दौड़ते हैं दिन–भर
तब सूरज हाँफकर
बैठ जाता है पंडी दादी के झोंपड़े के पीछे

जब बच्चे करते हैं निश्छल प्रेम
तब वारे-वारे जाते हैं
रोहिड़े के दरख़्त से फूल

जब बच्चे लहूलुहान पृथ्वी पर
बरसाते हैं चुग्गा
तब हिय में हिलोरे लेती है आज़ादी

जब बच्चों के पाँवों में आ जाते हैं बाबा के जूते
और पढ़-लिखकर मेमनों के हक़ में
भेड़ियों के खिलाफ़
उठाते हैं आवाज़
तब वे कवि हो जाते हैं
होने को हो सकते हैं देशद्रोही !

5.अठहत्तरवां पन्ना
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कितने दिनों बाद आज आया हूँ गाँव
यह ख़ुद को ही नहीं मालूम

जैसे ही
हाथों में बैग, चेहरे पर मुस्कान लिए
गाँव के चौपाल के बस स्टैंड उतरा
तो देखा—

जिस खेजड़े तले रात-दिन होती थी बातें
तासों के साथ-साथ
लगते थे ठहाके
पखेरूओं की भाषाओं का किया करते
यादों की कथरी सिलते हुए
बुज़ुर्ग लोग अपनी बोली में अनुवाद

अब वहाँ दो-तीन गायें जुगाली कर रही हैं
कर रहा है एक गधा लीद
सांगरी तोड़ने वाला कोई नहीं है
सो पककर
युगों की तरह खिर रही हैं
खेजड़े तले
प्लास्टिक पहने, कफ़न ओढ़े पड़ी है गाँव की लाश

खेजड़ा रो रहा माँ बायरे बच्चे की तरह
उसके आँसुओं की बूँदें
टप-टप-टप
पड़ रही हैं लाश के सिर पर

आपसी संवाद और हिंये का हेत
मरघट में जलकर राख हो गए

ऐसे समय में जब सब लोग
कर रहे हैं राजा के हुक्म का पालन
तब दक्षिण से उड़कर आई
कटी पतंग की छुअन नें
बूढ़े खेजड़े को दी थावस
आँसू पोंछता हुआ
शुक्रिया‐अदा कर पतंग से बोला खेजड़ा—

जिस तरह बनिया लोग अपनी बही-खातो में
छोड़ते आये थे छप्पनवां पन्ना खाली
उस तरह कहीं
भविष्य को अठहत्तरवां पन्ना खाली न छोड़ना पड़े !

6.फिर-फिर
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जीवन के पतझड़ में
झरता रहा
पत्तों के मानिंद

फिर-फिर मैं
हरा हुआ
कविता के आँचल में।

7.गाँव के नाम पाति
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मेरे प्यारे गाँव
यदि मैं कभी नहीं लौटा
गोधूलि बेला में
कंधों पर लाठी लिए चरवाहे या गड़रिये की तरह
या कि बच्चों की किलकारियों की तरह,
छाछ, राबड़ी की सुगंध की तरह
तो तू समझ लेना—
केरल की किसी नदी के किनारे
चम्पा-मेथी के गीत सुनता हुआ मर गया है तेरा कवि !

*चम्पा-मेथी राजस्थान के शीर्ष लोक गायक दंपत्ति थे।

परिचय :

संदीप निर्भय कविता और उम्र दोनों में युवा है।उनका गाँव-पूनरासर, बीकानेर है।वे बेरोज़गारी के थपेड़ों और ऐसे अनुभवों का संवाद अपनी कविता में करते हैं।

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