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साहित्य

सपना भट्ट की कविताएँ

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1.जोगभाग
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सारी जगहें हमेशा
किसी चीज़ के होने से नहीं भरतीं
जैसे मेरी आत्मा
उसके होने के अभाव से भर गई है
और मेरे एकांत की चौहद्दी पर
वह नहीं उसकी अजनबियत पसरी हुई है।

उसके लिए बुने स्वेटर के
फंदों में भर गई है हमारे अबोले दिनों की गिनतियाँ
और उसके रूठने मान जाने के दिनों का गणित।

जोग-भाग मेरा
ऐसी ही मोम की डिबिया
सरीखी जगह है रे!
सुख उसी में धरा मोती था ,
जरा तपिश से हवा हो गया ।
दुःख ने पनाह ली, सीने के पिंजर में ,
काँटे सा धँसा, बढ़ती साँसों के साथ
बरसों-बरस बना रहेगा

अक़्ल की मारी मैं
गणित के समीकरण सुलझाने में
और उलझाती गई
साम्य होता भी तो कैसे भला!
साँस रोककर दुःख घटाना था
आहों को साँसों में जोड़ कर
दुःख को द्विगुणित कर लिया

दुःख अब चिरंजीवी है।

2.दुर्निवार इच्छाएं
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तुम्हारी आवाज़
रात के अँधेरे में खिला
एक उजला फूल है।

जिसकी प्रतीक्षा मेरे कान नहीं
मेरी आँखें करती हैं हरदम ।

तुम्हारी मिट्टी में ऐसा क्या गूँथा ईश्वर ने !
तुम आख़िर किस विधि बने मीत!
कि तुम्हें देखकर
अपनी ही खोई हुई
निर्मल और निर्दोष हँसी की
रुआँसी याद आती है ।

तुम्हारे तीन अक्षर के नाम को
तस्बीह में पिरोकर
मैं दरअस्ल तुम्हें नहीं
अपनी ही आत्मा को पुकारती हूँ।

प्यार मेरे!
तुम्हें छूने से अधिक छू लेने
और देखने से अधिक देख पाने की
मेरी दुर्निवार इच्छाएँ इस पृथ्वी पर
मेरे अंतिम दिनों तक की सहचरी हैं
और ‘लौट जाना’ अब
मेरी भाषा और व्याकरण से
रूठा हुआ एक शब्द है।

3.मैं तुम तक आई
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ये जानते हुए भी
कि हर बंधन एक बाधा है
मैं तुम तक आई।

मैं तुम तक आई
मर्यादा की लंबी दूरी तय करके
छिलते कंधों , छूटती चप्पलों के साथ।
मुझसे नही छूटी, उम्मीद के छोर सी
कोई ट्रेन , कोई बस तुम्हारे शहर की कभी…

मैं तुम तक आई
नदियों, पुलों, चुंगियों और सस्ते ढाबों से गुज़रकर
मेरी चाय में तुम्हारे क़रीब पहुँचने की सुवास
इलायची की तरह शामिल रही।

मैं आई छुट्टियों में , कामकाजी दिनों में
त्योहारों से ऐन पहले या ज़रा बाद में
तुम्हारी राह देखी ,तुम्हारे ही चौखट के बंदनवार
और रंगोली की तरह
तुम्हारे सुख की कामना की मिठास
बताशों की तरह घुलती रही मेरे मन में।

मैंने नहीं देखी
कोई व्यस्तता , कोई परेशानी
घटता बीपी , बढ़ता यूरिक एसिड ।
मेरी दवाइयों की थैली में
तुम्हारे चेहरे की आभा लिए
हँसता रहा वसन्त
पीली लाल गोलियों की शक़्ल में।

सबका इस जहान में
किसी न किसी मंतव्य से आना तय है
मैं इस जग में आई
कि किसी रोज़ अपने द्वार पर
एक आकुल दस्तक पाकर
तुम अपनी ऐनक उतार, मुझे देखो
और कहो , आ गई तुम !
कब से राह देख रहा था तुम्हारी
देखो ! अब जाना मत।

4. ओ मेरी मृत्यु
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ओ मेरी मृत्यु !
अभी स्थगित रख अपनी आमद ।

कि अभी मैंने देखा नहीं समंदर कोई
अभी किसी वर्षावन में भटकी नहीं
आर्द्रता से भरा, खाली मन लेकर।

अभी किसी ऐसी यात्रा की सुखद स्मृति मेरे पास नहीं
कि जिसमे रेलगाड़ी में ही होती हों
तीन सुबहें और दो रातें ।

अभी हुगली के रेतीले तट पर
नहीं छोड़ी मैंने अपने थके हुए पैरों की भटकन।
अभी नौका में बैठाकर पार ले जाते
किसी मल्लाह की करुण टेर ने मुझे बाँधा नहीं।

अभी मेरे पास नहीं है दोस्तोवस्की का समूचा साहित्य
अभी मैंने किरोस्तामी को पूरा जाना नहीं।
अभी मजीदी की एक फ़िल्म
राह तकती है मेरी, फोन की गैलरी में चुपचाप।

अभी मेरा एक दोस्त जूझ रहा है हर साँस के लिए
अभी उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां नही रखीं
उसे दिलासा नही दिया।

अभी मेरी बेटी बच्ची ही है नन्ही सी
अभी मैंने उसे दोस्त नहीं किया
अभी पूछा भर है कि “प्यार में है क्या तू मेरी बच्ची”?
अभी अपने प्रेम के विषय मे बताने का साहस नहीं जुटाया ..

और तो और
अभी उस पगले से भी है एक ही मुलाकात
अधूरी और सकुचाई हुई
अभी उसने मेरा हाथ नहीं थामा
अभी उसने मुझे चूमा नहीं।

5. बीमारियां
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वे कितनी सहृदय बीमारियां थीं
जिनमें कुशल क्षेम जानने, दुख दर्द पूछने
आते रहे दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार घर।

मरीज़ का हाथ अपने हाथ मे लेकर
देते रहे दिलासा “कुछ नहीं होगा तुम्हे ” का
सुझाते रहे कोई नुस्खा, व्यायाम या पथ्य
बड़ी समझाइशों के साथ ।

आते समय लाते फल और जूस के डिब्बे
किताबे या कोई पुराने गीतों की कैसेट
उन्हें वापस करने की नसीहत भी कितनी
मीठी और आत्मीय होती थी।

दलिया खिचड़ी और मूंग की दाल से भरे
उन बर्तनों में कैसी दयावान सुगंध हुआ करती थी
और यह सदाशय इसरार भी कि बताओ
कल क्या खाओगे।

कोरोना की इस बीमारी से जूझते हुए
आदमी बस उस आत्मीय स्पर्श को तरसता है
जो अब सम्बन्धों से बिला गया है।

अकेले कमरे में लेटे हुए सोचता है कि
बीमारियां तो पहले भी थीं
पर इतनी क्रूर कब थीं।
आदमी और आदमी के बीच
इतना बेहिस फ़ासला कब था।

6.युक्ति
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साँस के क्लान्त शंख पर
निरन्तर बजती है
एक अनथक प्रार्थना !

एक उदासी नित
बैठ जाती है
धड़कन के थके, म्लान फूल पर

घनघोर यंत्रणा है यह जीवन
और प्रेम,उससे भी बड़ी ।

काश !
कि उसके प्रेम में
गिरने जितना ही सरल होता!
उस निर्मोही को भूल पाना भी ।

मेरे ईश्वर !
कोई तो युक्ति होगी!
कि बिछोह की दुर्बोध भाषा में मर कर
प्रेम की सरल बोली में तर सकूँ ….
जीवन में लौट सकूँ,
फिर प्यार कर सकूं।

परिचय:

सपना भट्ट उत्तराखंड से हैं।अंग्रेजी और हिंदी विषय से परास्नातक हैं और वर्तमान में उत्तराखंड में ही शिक्षा विभाग में शिक्षिका पद पर कार्यरत हैं।साहित्य, संगीत और सिनेमा में रुचि रखने वाली सपना की कविताएँ लंबे समय से विभिन्न ब्लॉग्स और पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

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