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उत्तर प्रदेश

गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ की सीट पर रहा है चौंकाने वाला इतिहास

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गोरखपुर : यूपी (UP) की सबसे हॉट सीट बन चुकी गोरखपुर (Gorakhpur) सदर सीट पर योगी को लड़ाने का भाजपा (BJP) का फैसला यूं ही नहीं है इसके पिछे कई मायने हैं। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो ये बात तो साफ है कि योगी की नजर लड़ते समय गोरखपुर – बस्ती मंडल की 41 सीटों पर रहेगी।

हालांकि, अभी तक इन सीटों पर ज्यादातर भगवा का ही कब्जा रहा है और भाजपा इस साल भी इन सीटों को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती।

इस सीट की एक – एक विधानसभा पर योगी ने अपनी पकड़ बना रखी है वो हर एक गली – मोहल्ले के कार्यकर्ताओं से लेकर प्रभावी लोगों तक से व्यक्तिगत तौर पर जुड़े हुए है। और यही वजह है कि 1998 से 2017 तक गोरखपुर संसदीय सीट से योगी को कोई हरा नहीं पाया था। हालांकि, शायद ही ऐसा कोई होगा जो योगी की चुनावी रणनीति से वाकिफ ना हो।

गोरखपुर सीट पर भाजपा का इतिहास

यूपी की 403 विधानसभा में गोरखपुर सदर विधानसभा 322 नबंर पर शामिल है। सन् 1951 में पहली बार इस सीट पर चुनाव हुआ था। तब पहली बार कांग्रेस के इस्तिहा हुसैन विधायक बने थे। उसके बाद 1962 में कांग्रेस (Congress) के नेमतुल्लाह अंसारी विधायक बने फिर 1967 में यह सीट भारतीय जनसंघ के पास चली गई और उदय प्रताप दुबे को विधायक बनाया गया। लेकिन 1989 में इस सीट को भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला ने कांग्रेस से छीन लिया। तब से इस सीट पर भाजपा का ही कब्जा है।

लेकिन क्या आपको पता है? योगी जो इस वक्त भाजपा के होनहार नेताओं में से एक है एक वक्त पर वो भाजपा से रुष्ट हो गए थे। जी हां, 2002 में योगी भाजपा से इस कारण से रुष्ट हो बैठे थे क्योंकि उनकी बात को नजरअंदाज किया जा रहा था। दरअसल, योगी ने भाजपा से कई बार विधायक शिव प्रताप शुक्ला को टिकट देने की मांग की लेकिन भाजपा ने उनकी बात को नजरअंदाज किया। तब योगी ने अपने चुनाव संचालक डॉ राधा मोहन दास अग्रवाल को निर्दलीय के रुप में चुनाव लड़वाया।

जिसमें भाजपा की शिकस्त हुई और राधा मोहन विधायक बन गए। हां, ये अलग बात है कि भाजपा ने बाद में योगी के सामने हार मान ली और फिर राधामोहन भाजपा में शामिल हो गए। योगी आदित्यनाथ ये वो नाम है जो चुनाव के मैदान में अगर उतर जाए तो उन्हें हराना आसान बात नहीं है। फिर चाहे वो जाति समीकरण का टूटना हो या फिर चुनावी बिसात बिछाना।

वर्तमान में अगर गोरखपुर सदर सीट के मतदाताओं पर नजर डाली जाए तो वहां जाति समीकरण जैसी किसी चीज का नामोनिशान नहीं है। इन 4,53,662 मतदाताओं में 2,43,013 पुरुष और 2,10,574 महिला, 45 हजार से अधिक कायस्थ, 60 हजार ब्राह्मण, 15 हजार क्षत्रिय, 35 हजार निषाद, 20 हजार दलित, 15 हजार यादव, 30 हजार मुस्लिम मतदाता एवं 50 हजार से ज्यादा वैश्य मतदाता है।

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