वह सच जो आपसे अछूता रहा है~पढ़ें कृष्ण जन्मभूमि के विवाद की पूरी कहानी, फैक्ट्स के साथ

Krishna Janmabhoomi dispute full Story: राम मंदिर का विवाद खत्म होने के बाद अब मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद छिड़ गया है. मथुरा की एक स्थानीय अदालत ने 16 अक्टूबर, 2022 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर – ईदगाह मस्जिद विवाद (Shrikrishna Janambhumi and Shahi Eidgah Maszid Dispute) के मामले में दाखिल एक याचिका स्वीकार कर ली गई थी। याचिका में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.7 एकड़ जमीन का मालिकाना हक देने और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की गई है.

याचिका में मस्जिद समिति और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के बीच सन् 1968 में हुए समझौते को अवैध बताया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि जिस जगह आज श्रीकृष्ण जन्मस्थान है, वहां 5 हजार साल पहले कंस का कारागार था, जिसमें भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था. अदालत ने मामले में सुनवाई की अगली तारीख 18 नवंबर. 2020 तय कर दी थी, फिलहाल कानूनी लड़ाई जारी है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 17वीं सदी में औरंगजेब के शासन में बनी यह शाही मस्जिद भगवान कृष्ण के जन्मस्थान मंदिर (केशव देव मंदिर) के 13.7 एकड़ के परिसर में बनाई गई है.

controversary

 

कृष्ण जन्मस्थली की कानूनी लड़ाई का अब तक कैसा रहा सफर ?

जब अंग्रेजों ने 1815 में कटरा केशवदेव मंदिर की 13.37 एकड़ भूमि की नीलामी की, तब बनारस के राजा पटनीमल ने इसे खरीद लिया. श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही मस्जिद ईदगाह के बीच पहला मुकदमा सन् 1832 में शुरू हुआ था, तब से लेकर अब तक कई बार मुकदमेबाजी हुई. मुस्लिम पक्ष ने कई बार यह बात रखी कि नीलामी जो हुई, वह ईदगाह छोड़कर हुई है, जबकि मंदिर पक्ष का कहना है कि कोर्ट के आदेश है कि नीलामी में ईदगाह कि जगह भी शामिल है. इसका सबूत यह है कि ईदगाह जिस भूमि में है, उसका टैक्स भी हम दे रहे हैं. आपको बता दें कि ईदगाह कि ओर से अताउल्ला खान ने तारीख 15 मार्च, 1832 को तत्कालीन कलेक्टर के यहां प्रार्थनापत्र देकर कहा था कि सन 1815 में जो नीलामी हुई है, उसको निरस्त किया जाए और ईदगाह की मरम्मत की अनुमति दी जाए। लेकिन 29 अक्टूबर, 1832 को तत्कालीन कलेक्टर डब्ल्यू एच टेलर ने एक आदेश दिया, जिसमें नीलामी को उचित बताया गया और कहा गया कि इस समस्त 13.7 एकड़ भूमि पर मालिकाना हक पटनीमल राज परिवार का है. सन् 1935 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी वाराणसी के हिंदू राजा को जमीन के कानूनी अधिकार सौंप दिए थे, जहां आज मस्जिद खड़ी है.

maszid

सन् 1940 में जब यहां पंडि‍त मदन मोहन मालवीय आए, तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखकर वे काफी निराश हुए. मालवीय जी ने जुगलकिशोर बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के उद्धार को लेकर एक पत्र लिखा. मालवीय जी की इच्छा का सम्मान करते हुए बिड़ला ने दिनांक 7 फरवरी, 1944 को कृष्ण जन्मभूमि मंदिर को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से खरीद लिया. बिड़ला ने तारीख 21 फरवरी, 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की. ट्रस्ट की स्थापना करने के साथ ही यह मंदिर ट्रस्ट के अधीन चला गया जबकि इससे पहले इसकी जिम्मेदारी भरतपुर नरेशों के पास थी. ट्रस्ट की स्थापना से पहले ही यहां रहने वाले कुछ मुसलमानों ने सन् 1945 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट दाखिल कर दी, जिसका फैसला सन् 1953 में आया. फैसले के बाद ही यहां गर्भगृह और भव्य भागवत भवन का निर्माण कार्य आरंभ हुआ, जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ लेकिन मस्जिद ज्यों की त्यों रही.

janambhumi

बता दें कि मथुरा श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही मस्जिद ईदगाह (Shahi Eidgah) के विवाद को लेकर 136 साल तक केस चला था. जिसके बाद अगस्त 1968 में महज ढाई रूपये के स्टांप पेपर पर तत्कालीन डीएम व एसपी के सुझाव पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी ने एक समझौता किया था. इसी समझौते को अब मंदिर पक्ष कोर्ट में अवैध बता (Krishna Janmabhoomi dispute full Story) रहा है. शाही ईदगाह पक्ष का इस मसले पर कहना है कि ये विवाद जबरन पैदा किया जा रहा है क्योंकि सालों पहले इस मामले में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट में सौहार्दपूर्ण ढंग से रजिस्टर्ड समझौता हो गया है.

कितनी बार टूटा – कितनी बार बना मंदिर ?

पौराणिक कथाओं के अनुसार जिस जगह पर आज कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान है, वहां पांच हजार साल पहले राजा कंस का कारागार हुआ करता था. इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्‍ण ने जन्‍म लिया था. इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने कटरा केशवदेव को ही कृष्ण जन्मभूमि माना है. मथुरा के राजनीतिक संग्रहालय से सम्बन्ध रखने वाले कृष्णदत्त वाजपेयी ने भी माना है कि कटरा केशवदेव ही कृष्ण की असली जन्मभूमि है. 80 ईसापूर्व के महाक्षत्रप सौदास के समय के एक ब्राम्ही लिपि में लिखे शिला लेख से ज्ञात होता है कि किसी वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मंदिर तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था.

Krishna Janmabhoomi dispute full Story

प्रचलित मान्यता के अनुसार, कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र यदुवंशी राजा बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में 80 वर्ष ईसा पूर्व में एक मंदिर बनवाया था, जो इति‍हासकारों के अनुसार हूण, कुषाण आदि  हमलों में कई बार ध्वस्त हुआ. बाद में सन् 400 ई० में गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने यहाँ एक वृहद् मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया.

दिल्ली के वो मशहूर मंदिर जिनकी भव्यता कराती है भगवान के साक्षात दर्शन- खूब है मान्यता!

खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है कि जाजन सिंह तोमर (कुंतल) ने 1150 ईस्वी में राजा विजयपाल देव के शासनकाल के दौरान श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक नया भव्य और विशाल मंदि‍र बनवाया था, जिसे 16 वीं सदी में सिकंदर लोदी ने ध्वस्त करा दिया लेकिन एक बार फिर जहांगीर के शासनकाल के दौरान 1618 ई० में ओरछा के बुन्देला (Krishna Janmabhoomi dispute full Story) राजा वीरसिंह जूदेव ने यहाँ विशाल कृष्ण जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण कराया, जिसकी ऊँचाई 250 फीट थी. ऐसा बताया जाता है कि यह आगरा से भी दिखाई देता था. उस समय इस निर्माण की लागत 33 लाख रुपये आई थी. इसी मंदिर को मुगल शासक औरंगजेब ने सन् 1669 में नष्ट कर यहाँ स्थापित मूर्तियों को हटवा दिया और इसके एक भाग पर केशवनाथ मंदिर को नष्ट कर शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण करा दिया था.

shahi eidgah

औरंगजेब ने इस काम के लिए बकायदा फरमान जारी किया था. मुगल शासन पर कई पुस्तक लिखने वाले यदुनाथ सरकार की ‘एनिट डॉट्स ऑफ औरंगजेब’ नामक पुस्तक में भी औरंगजेब के फरमान की कॉपी है. लेखक यात्री निकोलम मनूची ने भी अपनी किताब ‘इस्टोरिया डो मोगर’ में इस घटना का जिक्र किया है. कहा जाता है कि इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर औरंगजेब ने सन 1669 में इसे तुड़वा दिया. यहां प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदि‍र के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा मौजूद था. मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में एक कुआं भी बनवाया गया था. इस कुएं से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदि‍र के प्रांगण में बने फव्‍वारे को चलाया जाता था. इस स्थान पर उस कुएं और बुर्ज के अवशेष अभी तक मौजूद है.

औरंगजेब द्वारा मंदिर तोड़े जाने के बाद जब जाटों ने मुगलो की राजधानी आगरा पर आक्रमण किया, तब सूरजमल जाट ने एक बार फिर मंदिर का पुनरुद्धार कराया. बाद में जब मराठाओं ने 5 अप्रैल, 1770 को गोवर्धन की जंग में मुगल शासकों को हराया, तब पुनः एक भव्य मंदिर बनवाया.

कानूनी लड़ाई में सबसे बड़ा अड़ंगा है उपासना स्थल (विशेष) अधिनियम – १९९१

कृष्ण जन्मभूमि – ईदगाह मस्जिद विवाद में सबसे बड़ा अड़ंगा यह एक्ट है. यह एक्ट 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में आए हुए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी स्मारक के धार्मिक आधार पर रखरखाव पर रोक लगाता है. 90 के दशक की शुरुआत में जब रामजन्मभूमि आंदोलन अपने (Krishna Janmabhoomi dispute full Story) चरम पर था, तब अयोध्या में बाबरी मस्जिद के साथ ही उन तमाम मस्जिदों को मंदिर में परिवर्तित करने की मांग उठने लगी, जहां पूर्व में कथित तौर पर मंदिर रहे थे, या मंदिर होने का दावा और विवाद था. ऐसे समय में नरसिम्हा राव की सरकार ने सांप्रदायिक उन्माद को शांत करने के लिए एक कानून बनाना आवश्यक समझा और वह कानून था, प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट यानी उपासना स्थल अधिनियम.

Krishna Janmabhoomi dispute full Story

तत्कालीन गृह मंत्री, शंकरराव चव्हाण ने 10 सितंबर 1991 में लोकसभा में बहस के दौरान इस बिल को भारत के प्रेम, शांति और आपसी भाईचारे के महान संस्कारों का एक सूचक बताया और कहा कि ‘सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता हमारी महान सभ्यता का चरित्र है. यह एक्ट मान्यता प्राप्त प्राचीन स्मारकों और (Krishna Janmabhoomi dispute full Story) अयोध्या में स्थित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद संबंधित किसी भी कानूनी वाद लागू नहीं होता है क्योंकि यह माना गया कि इसका विवाद 1947 से पहले से चल रहा है. इस अधिनियम ने स्पष्ट रूप से अयोध्या विवाद से संबंधित घटनाओं को वापस करने की अक्षमता को स्वीकार किया. यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत के लिए था.

श्री राम जन्मभूमि मंदिर के चबूतरे का लगभग निर्माण हुआ पूरा, देखें अद्भुत तस्वीरें

Add Comment

   
    >
राजस्थान की बेटी डॉ दिव्यानी कटारा किसी लेडी सिंघम से कम नहीं राजस्थान की शकीरा “गोरी नागोरी” की अदाएं कर देगी आपको घायल दिल्ली की इस मॉडल ने अपने हुस्न से मचाया तहलका, हमेशा रहती चर्चा में यूक्रेन की हॉट खूबसूरत महिला ने जं’ग के लिए उठाया ह’थियार महाशिवरात्रि स्पेशल : जानें भोलेनाथ को प्रसन्न करने की विधि