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उत्तराखंड

एक शहीद की विधवा से लेफ्टिनेंट बनने का सफर, स्वाति महादीक ने निभाया पति से किया वादा

40 साल की स्वाति महादीक ने अपने पति संतोष महादीक की मौत के बाद कड़ी मेहनत और जज्बे की बदौलत लेफ्टिनेंट स्वाति का मुकाम हासिल किया।

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देश के कुर्बान होने वाले शहीदों की बेवा को कभी आपने देखा है, उनकी आंखों में देखिए आपको उनके बहादुर पति की तरह देश के लिए कुछ कर गुजरने की झलक दिखेगी। एक कवि ने कहा है कि, शहीदों की बेवाओं का कलेजा समंदर की गहराई और आसमान की ऊंचाई के बराबर होता है।

ऐसी ही एक महिला की कहानी आज आपको बताने जा रहे हैं जिनके पति जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।

नाम है स्वाति महादीक, उम्र 40 साल, 15 साल की बेटी और 8 साल के एक बेटे की बहादुर मां। स्वाति के पति संतोष महादीक भारतीय सेना के विशेष दस्ते 41 राष्ट्रीय राइफल्स में एंटी टेरर दस्ते में तैनात थे।

पति की मौत के बाद स्वाति के लिए सबकुछ बदल गया लेकिन एक साल बाद उन्होंने सेना में जाने की इच्छा जाहिर की। आखिरकार कड़ी मेहनत और जज्बे की बदौलत स्वाति के नाम के आगे लेफ्टिनेंट जुड़ गया और आज वह लेफ्टिनेंट स्वाति महादीक कहलाती है।

कड़ी मेहनत से दी बढ़ती उम्र को मात

अपने पति की मौत के बाद स्वाति खुद को पहले से ज्यादा मजबूत महसूस करने लगी। स्वाति अब अपने पति का सपना और घर की देखभाल जैसी बड़ी जिम्मेदारियां संभाल रही थी।

स्वाति की उम्र उनके सेना में जाने के सपने में अड़चन बन रही थी। आखिरकार उस समय के सेना प्रमुख के कहने के बाद स्वाति ने फिर एसएसबी का एग्जाम दिया और सफलता हासिल की। इसके बाद 2016 में वो सर्विस सेलेक्शन कमीशन की फाइनल लिस्ट में आ गई और चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में उनकी ट्रैनिंग हुई।

पति के अधूरे सपने को पत्नी ने किया पूरा

स्वाति के पति को अपनी वर्दी और देश से बेहद प्यार था। स्वाति अपने पति के जाने से पहले पुणे के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाया करती थी लेकिन पति की मौत के बाद स्वाति ने उस वर्दी से प्यार को जारी रखते हुए स्कूल छोड़ दिया और खुद सेना में भर्ती हो गई। स्वाति आज शहीदों की पत्नियों और हम सभी के लिए एक मिशाल है जो जीवन में कभी भी हार नहीं मानने के लिए प्रेरित करती है।

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