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पश्चिम बंगाल

घर और समाज ने किया अपमान, जोइता मंडल जिन्होंने पहली किन्नर जज बनकर खुद को किया साबित

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हमारे समाज में आजादी के 70 से अधिक साल बीत जाने के बाद भी किन्नरों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। किन्नरों का तबका आज भी समाज में उपेक्षित महसूस करता है, ऐसे में किन्नरों की जिंदगी का अपना एक संघर्ष है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते हैं।

लेकिन कुछ ऐसे विरले होते हैं जो इन्हीं के बीच से निकलकर समाज में एक नई पहचान बनाते हैं। आज हम एक ऐसी ही कहानी आपको बताएंगे जिसकी नायक है जोइता मंडल , जिन्होंने पहली ‘किन्नर’ न्यायाधीश बन कर इतिहास रचा है। जोइता को पश्चिम बंगाल सरकार ने लोक अदालत का न्यायाधीश बनाया है। आइए आपको बताते हैं कैसा रहा इनका सफर।

बेरहमी से पीटते थे घरवाले

जोइता किन्नर होने के नाते अपने पुराने दिनों को याद कर आज भी सहम जाती है। वह बताती है कि उसे नहीं पता था कि उसका बचपन ऐसे गुजरेगा। 18 साल की होने पर दुर्गा पूजा के दौरान उसका सजने संवरने का मन करता था, ऐेसे में एक दिन वह सजकर घर पहुंच गई जिसके बाद उसके घरवालों ने उसे बहुत पीटा ।

कॉलेज में सभी उड़ाते थे मज़ाक

जोइता कॉलेज के दिनों की याद करते हुए कहती है कि कॉलेज के दौरान हर कोई उनका मजाक उड़ाया करता था जिसके चलते उन्होंने कॉलेज बीच में छोड़ दिया। कॉलेज छोड़ने के बाद जोइता ने रेलवे स्टेशन और बस अडडों पर बैठकर अपना समय बिताया। कुछ दिन सड़कों पर गुजारने के बाद जोइता ने दूसरे किन्नरों की तरह बच्चा पैदा होने पर बधाई गाने और शादी में पैसे लेने का काम करने लग गई।

समाज के लिए करने लगी काम

जोइता काम करती गई और धीरे-धीरे उसकी आर्थिक हालत सही होने लगी तो जिस समाज ने उसे निकाला था वह उसी के बारे में सोचने लगी।  इसी कड़ी में जोइता ने 2010 में दिनाजपुर में एक संस्था स्थापित की जो किन्नरों को उनका अधिकार दिलाने के लिए काम करती है। इसके अलावा उन्होंने वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम बनवाए।

वह मेहनत करती गई और एक दिन हाइकोर्ट ने किन्नरों को तीसरे जेंडर के रूप में मान्यता देने के बाद अपनी मेहनत के बूते वह 8 जुलाई 2017 को राज्य सरकार द्वारा लोक अदालत की जज नियुक्त की गई।

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